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जरूरी है इस मर्ज का इलाज

अयोध्या के विवादित ढांचे को गिराए जाने की जांच कर रहे लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट का खुलासा भी नहीं हुआ था कि अपनी चुक गई सियासत को फिर से चमकाने के लिए उमा भारती उस शर्मनाक कांड की जिम्मेदारी लेती दिखीं। इसके पहले बाल ठाकरे भी इस शर्म को अपने माथे पर गर्व की तरह प्रस्तुत कर चुके हैं। अब समाजवादी हो गए कल्याण सिंह तो कई बार उस कांड की जिम्मेदारी लेते हुए फांसी पर लटकने की ख्वाहिश दिखाते रहे हैं। जो काम संविधान-विरुद्ध था, जो कानून की निगाह में गुनाह था, जो देश के सामाजिक ढांचे पर चोट था; ऐसे गंभीर अपराध का इकबालिया बयान करोड़ों लोगों के सामने! फिर भी हमें इंतजार है कि कोई अदालत बंद कमरे में इसे सुने और किताबों व कानून के सुराखों से बचते हुए उन्हें कुछ सजा सुनाए।

लगता है कि रसूखदार बनने की पहली शर्त यही है कि विधि द्वारा स्थापित कानून के विरूद्घ कुछ न कुछ जरूर करो। राज ठाकरे जब अदालत के सामने मुजरिम के रूप में पेश होते हैं तो उन्हें कोई ग्लानि नहीं होती, उनका नायकत्व झलकता है। आंध्रप्रदेश का एक सांसद कैमरे के सामने बैंक मैनेजर को थप्पड़ लगाते हुए उसको जायज ठहराने से नहीं चूकता है। एक केद्रीय मंत्री हाईकोर्ट के जज को धमकाता है। सर्वोच्च अदालत जब दिल्ली में गैरकानूनी निर्माणों पर उंगली उठाती है तो खून बहाने की धमकी के साथ नेता सड़क पर आ जाते हैं। भले ही विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालय चेताते रहे हों कि बंद और सड़क जाम गैरकानूनी है; चाहे आरक्षण की मांग हो या फिर बिजली आपूर्ति की लाखों लोगों का जनजीवन ठप्प करने में छुटभैये नेताओं को कोई संकोच नहीं होता है। किसी को भी इसकी परवाह नहीं है- न नगर निगम को, न पुलिस को और न ही मगरूर नेताओं को। अदालतें बढ़ते मुकदमों के बोझ से परेशान हैं। कानून तोड़ने वाले जानते हैं कि जब सदी के सबसे बड़े अपराध की जांच रिपोर्ट आने में 17 साल लगते हैं तो उसका फैसला आने में न जाने कितने साल लगेंगे? यही बात वरूण गांधी भी जानते थे, तभी वे छाती ठोक कर सांप्रदायिक तनाव फैलाने वाले बयान देते रहे। बकौल कानून, वरूण का चुनाव अवैध घोषित होना चहिए, लेकिन जब तक अदालत का फैसला आएगा, वे बतौर सांसद पूरे कार्यकाल का ठाठ उठा चुके होंगे।

आखिर कानून का पालन करवाने की जिम्मेदारी किस पर है? पुलिस पर? जिसे आम लोग एक आफत और झूठ का पुतला मानते हैं। देश में कहीं भी ‘कुख्यात बदमाश’ पुलिस के हाथों मारा जाए, कहानी एक सरीखी क्यों होती है? हर जब्ती व मौका-मुआयना के गवाह कुछ गिने-चुने व्यक्ति ही क्यों होते हैं? थाने या सड़क पर निरपराध लोगों की लाठियों से पिटाई क्या कानून सम्मत है? अपराध होने पर या फिर अराजकता से सही तरीके से न निबट पाने पर अभी तक कितने पुलिस वालों को जिम्मेदार माना गया? पुलिस या उसका डंडा मौजूदा कानूनी ढांचे की सबसे असफल देन है और पुलिस से आतंक तो कायम किया जा सकता है, कानून-व्यवस्था नहीं। कानून के हाथ कितने संकुचित हो गए हैं। मुंबई बम धमाके, गुलशन कुमार हत्याकांड, जैसे कई मामलों के मुजरिम विदेश में हैं और हमारा कानून उन्हें अदालत तक नहीं ला पाया। उल्फा का अनूप चेतिया हो या फिर मिजो खपलांग गुट के आतंकवादी या फिर खालिस्तानी पंजवार, कानून को अंगूठा दिखाते हुए सरहद से कुछ किलोमीटर दूर बैठ कर भारत में कानून का मखौल उड़ाते रहते हैं। उड़ीसा के पुलिस महानिदेशक स्तर के एक अधिकारी के बेटे को राजस्थान की एक फास्ट ट्रैक अदालत विदेशी महिला के साथ बलात्कार का दोषी पाकर सजा सुनाती है और दोषी कानून की बारिकियों का फायदा उठा फरार हो जाता है। दो साल हो गए, पुलिस बता नहीं पा रही है कि अपराधी को जमीन निगल गई या आसमान खा गया।

जेलों में बड़े माफियाओं की समानांतर सरकार चलती है, जेल सुधार-गृह नहीं, यातना-गृह हैं, जेल का माहौल नए अपराधी तैयार करता है; ये बातें कानूनविद और समाजशास्त्री सभी स्वीकार कर रहे हैं। इसके बावजूद हर रोज कोई दो लाख लोगों को बगैर अपराध सिद्ध हुए जेल भेजना जारी है। देश की बड़ी और घनी आबादी, भाषाई, सामाजिक और अन्य विविधताओं को देखते हुए मौजूदा कानून और दंड देने की प्रक्रिया पूरी तरह असफल रही है। 70 के दशक की एक फिल्म में हत्या के दोषी पाए गए राजेश खन्ना को फरियादी के घर पर देखभाल करने के लिए रखने पर उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है। अभिषेक बच्चन की एक फिल्म में बड़े बाप के बिगड़ैल युवा को एक वृद्घाश्रम में रह कर बूढ़ों की सेवा करनी पड़ती है। वैसे पिछले साल दिल्ली में एक लापरवाह ड्राइवर को सड़क पर खड़े हो कर 15 दिनों तक ट्रैफिक का संचालन करने की सजा वाला मामला भी इसी श्रृंखला में देखा जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य कि ऐसी व्यावहारिक सजा को बाद में बड़ी अदालत ने कानूनसम्मत न मानते हुए रोक लगा दी थी।

आजादी के बाद चुने हुए प्रतिनिधियों, नौकरशाही ने किस तरह आम लोगों को निराश किया, इसकी चर्चा अब मन दुखाने के अलावा कुछ नहीं करती है। यह समाज ने मान लिया है कि उसे सुधारना नामुमकिन है। भले ही हमारी न्याय व्यवस्था में लाख खामियां हैं, अदालतों में इंसाफ की आस कभी-कभी जीवन की सांस से भी दूर हो जाती है। इसके बावजूद देश को विधि सम्मत तरीके से चलाने के लिए लोग अदालतों को उम्मीद की आखिरी किरण तो मानते ही हैं। लेकिन अब सरकारी संस्थाएं अदालत के निर्देशों पर जिस तरह का रुख दिखा रही है, वह न केवल शर्मनाक है, बल्कि इससे संभावना जन्म लेती है कि कहीं पूरे देश का गणतंत्रात्मक ढांचा ही पंगु न हो जाए। न्यायिक व्यवस्था बेहद महंगी, डरावनी और लंबी खिंचने वाली है। गरीब लोग तो वकीलों की फीस व अन्य खचरें को वहन करने में असमर्थ रहते हैं और उनके लिए न्याय की आस बेमानी है। अदालतों की संख्या बढ़ाना देश के वित्तीय ढांचे पर बड़ा बोझ होगा। राज ठाकरे या वरूण गांधी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से वंचित रखने, उमा भारती या थप्पड़ मारने वाले सांसद को सार्वजनिक जीवन से रूखसत करने जैसे निर्णय त्वरित क्यों नहीं लिए जा सकते? वकीलों का एक वर्ग ऐसी सिफारिशों को अव्यावहारिक और गैरपारदर्शी या असंवदेनशील करार दे सकता है, लेकिन क्या मौजूदा कानून व्यवस्था इन बुराइयों से लवरेज नहीं है?

pankaj_chaturvedi@hotmail.com
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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