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एक लाचार पटकथा

पहला सीन ये है कि यहां श्मशान जैसी शांति के माहौल में व्यवस्था बगुला भगत की तरह एक टांग उठाए खड़ी है। नवोदित प्रशासन अपनी पंगुता में प्रसन्न है। कानून ने अपनी अंधी आंख में काजल पोत लिया है। न्याय तो यूं भी धृतराष्ट्र था अब वो राष्ट्र और महाराष्ट्र भी है। कैमरे को मोड़ें तो राजनीति अपने पेशे के अनुसार गुणीजनों को रिझाने में लगी है। चूंकि उसका चरित्र नगरवधू सा है, अतः वह सदा सुहागन है। अखंड सौभाग्यवती। वो अक्सर अपने बूढ़े तबलचियों को भी ललचाए रखती है। युवाओं को विगलित करने के लिए इन दिनों वह कम कपड़ों में सुविधाजनक लग रही है। लांग शॉट में देखें तो खुर्राट नेतागण एक बार फिर देश की चिंता में जनता का जूस पीने में व्यस्त हैं। उनकी भंगिमाओं और मुद्राओं-चेष्टाओं से लगता है, उन्हें हार के कारणों की नहीं अपने कारणों की चिंता है। एक ओर दल है, दूसरी ओर विचारधारा। दोनों एक दूसरे को लतिया रहे हैं, किन्तु छोड़ नहीं रहे।

मिडशॉट में जाएं तो पूर्ण बहुमत के मुगल गार्डन में कागजी फूलों की नर्सरी सजने लगी है। विपक्ष शिवजी की तीसरी आंख की तरह लाचार है, क्योंकि आंख में मोतियाबिंद उभर आया है। पूरे राष्ट्रीय स्क्रीन पर देखें तो एक हास्य प्रधान तांडव में लास्य भाव मुंबई की उस नाबालिग कामवाली की तरह कैमरे के सामने मुंह छुपाए बैठी है, जो अभी-अभी शाइनी आहूजा के घर से निकली है। फिलहाल लंच चल रहा है। खाद्य सामग्री वामपंथी तेवरों की तरह शिथिल व बेस्वाद सी हैं। बंगाल की प्रसिद्ध मिठाई में रस निचुड़ गया है, सिर्फ गुल्ला बचा है। फिल्म में देश प्रेम का तड़का जरूरी है, सो भूतपूर्व भरत कुमार उर्फ मनोज कुमार के सुझवानुसार कोई उत्तेजक हीरोइन भारत माता की बासी मूर्ति के आगे ताबड़-तोड़ नाचेगी और गाना बजेगा कि मेरा रंग दे वसंती चोला। यहीं एक चालू किंतु सफल निर्देशक की अपील मान ली जाएगी कि हीरोइन का चोला क्या होता है जी। अतः गीतकार उसे मेरी रंग दे वसंती चोली कर डालता है। खैर गैर फिल्मी बात करिए। सब जानते हैं कि साहित्य के सदन में व्यंग्य की भूमिका विपक्ष की होती है। मेरी बाकी बची पटकथा में लोकसभा चैनल सह-निर्माता हैं। सीन ये है कि युवा सांसद प्रायोजित दलितों की पंचसितारा झोपड़ियों में रात्रि निवास कर रहे हैं। सभी वितरक ए. आर. रहमान की धुन में प्रार्थना कर रहे हैं कि - हे प्रभो, आनंददाता, ज्ञान हमको दीजिए। कट। कट। पटकथाकार ने उन्हें टोका- अबे जहिलो आनंददाता से ज्ञान मांग रहे हो? शर्म नहीं आती। वे न माने। उन्होंने बैल दुह ही लिया। आर्ट फिल्म हिट हो गई।

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