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कानून के आगे

समलैंगिकता के बारे में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला कई अर्थो में महत्वपूर्ण है। यह पहली बार हुआ है कि भारत में हाईकोर्ट के स्तर के एक संवधानिक संथान ने धारा 377 की संवधानिक प्रासंगिकता पर सवाल उठाया है। कुछ वक्त पहले दिल्ली हाई कोर्ट ही इस मामले में याचिका को खारिज कर चुका था। हाईकोर्ट ने ही कहा है कि जब तक संसद इस कानून को नहीं बदलती तब तक उसका यह फैसला स्थगित रहेगा, लेकिन इस फैसले से धारा 377 की बहस में एक बड़ा परिवर्तन आएगा। जसे कि पहले भी कहा जा चुका है कि मामला कानूनी प्रावधान का उतना नहीं है, क्योंकि इस कानून का उपयोग शायद ही कभी होता है, थोड़ा बहुत दुरुपयोग ही कभी-कभार देखने में आता है। असली मुद्दा सामाजिक और वैचारिक बदलाव का है, अगर वह हो गया तो कानूनी बदलाव आसान हो जाएगा। यह फैसला समाज में समलैंगिकता के प्रति बदले नजरिए का सूचक भी है और वह बदलाव को तेज भी करेगा। दरअसल, समलैंगिकता को लेकर बहस दो किस्म के लोगों की वजह से है। एक किस्म के वे लोग हैं जो जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे हैं और उनका अनुभव यह है कि धारा 377 की वजह से एड्स और दूसरे यौन रोगों को रोकने में दिक्कतें आ रही हैं। दूसरी किस्म के वे लोग हैं, जो अनेक वजहों से प्रसिद्ध और ग्लैमरस हैं और जिनकी वजह से यह मामला ज्यादा चर्चित रहता है। लेकिन इस बहस का और इस फैसले का महत्व इस वजह से भी है कि यह कहीं न कहीं भारतीय समाज में आ रहे बदलावों और उन बदलावों के स्वीकार का प्रतीक है। नैतिकता और शुचिता की कई धारणाएं हमने उन्नीसवीं शताब्दी के ब्रिटिश शुद्धतावाद से ग्रहण की हैं और उन्हें भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग मान लिया है। लेकिन भारतीय समाज की एक बड़ी ताकत उसका लचीलापन है जिसके चलते वह बेहद क्रांतिकारी किस्म की धारणाओं को भी अपने ढंग से स्वीकार कर लेता है। धारा 377 का मामला एक बहुत छोटे समूह के यौन अधिकारों से संबंधित है, लेकिन जब यहां से यह बहस आगे बढ़ेगी तो कई मूल्यों और स्थापनाओं को चुनौती देगी और यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय समाज कैसे इस चुनौती का सामना करता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अच्छा काम किया कि इस बहस से एक अवरोध हटा कर इसे आगे बढ़ा दिया।

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