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आर्थिक समीक्षा में कृषि उत्पादकता बढ़ाने पर जोर

आर्थिक समीक्षा में कृषि उत्पादकता बढ़ाने पर जोर

आर्थिक समीक्षा 2008-09 में देश की 52 फीसदी आबादी की रोजी रोटी के अधार, कृषि क्षेत्र के समक्ष चुनौतियों को रेखांकित करते हुए इस क्षेत्र की उत्पादकता में सुधार लाने की की जरूरतों पर बल दिया गया है।

गुरुवार को संसद में पेश समीक्षा में कहा गया है कि कृषि क्षेत्र विभिन्न मोर्चो पर चुनौतियों का सामना कर रहा है। आपूर्ति पक्ष में अधिकांश फसलों की उपज में कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं दिखाई दिया है और कुछ मामलों में उपज घटी है। उत्पादकता बढ़ाने की ओर ध्यान दिये जाने की स्पष्ट आवश्यकता है। समीक्षा में सकल घरेलू उत्पाद में 17.8 फीसदी का योगदान करने वाले इस क्षेत्र में कृषि जोतों के आकार के सिकुड़ने की बात को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि गन्ने जैसी कुछ फसलों के मामले में विगत वर्षो में प्रति एकड़ और उत्पादन में भारी मात्रा में घट-बढ़ चिंता का विषय है।

समीक्षा में वित्तीय समेकीकरण समिति की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि देश के 73 प्रतिशत से अधिक किसान परिवारों की ऋण के औपचारिक स्रोत तक पहुंच नहीं है। समीक्षा में कहा गया है कि नये तरह का सांस्थानिक तंत्र वक्त की मांग है जो कृषि क्षेत्र की जोखिम धारक क्षमता को ध्यान में रखकर बनाया गया हो तथा जो ऋण और बीमा उत्पाद सहित वित्तीय उत्पाद की व्यवस्था करता हो।

वर्ष 2008-09 में कृषि वृद्धि घटकर1.6 प्रतिशत रह गयी जो वित्तवर्ष 2007-08 में 4.9 प्रतिशत थी। इसमें कहा गया है कि दालों के मामले में उत्पादन आवश्यकता के अनुरूप नहीं हुआ जिसके कारण मूल्यों में बढ़ोतरी हुई। साथ ही इसके अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्धता के सीमित होने की बात को भी सामने रखा गया है। उत्पादकता में सुधार करने के लिए नये सिरे से विचार किये जाने की आवश्यकता को बताते हुए इससे संबद्ध गतिविधियों और गैर-कृषि गतिविधियों को बढ़ाने की जरूरत बताई गई है जो मूल्यवर्धन में सुधार करने में सहायक हो सकती है।

समीक्षा में कहा गया है कि ग्रामीण आधारभूत ढांचा विशेष रूप से ग्रामीण सड़कों के विकास पर मौजूदा ध्यान बनाये रखने की आवश्यकता है ताकि कृषि उत्पादों का आसान आवागमन हो सके और इससे किसानों की आय को बढ़ाया जा सके। इसमें सिंचाई क्षेत्र में निवेश और आधुनिक प्रबंधन दोनों के संदर्भ में नये सिरे से ध्यान देने की जरूरत बताई गई है।

इसमें कहा गया है कि उपयुक्त विपणन समर्थन के जरिये उत्पाद मूल्यों और उपभोक्ता मूल्यों के अंतर को कम करने की जरूरत है। इसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अंतरसंबंधित आर्थिक गतिविधियों को निरंतर बनाये रखने की आवश्यकता को बताया गया है।

समीक्षा में पर्यावरण चिंताओं पर यथोचित ध्यान देते हुए कृषि के टिकाउपन के मुद्दे पर जोर दिया गया है। इसमें कहा गया है कि भूक्षरण, जल अवरूद्धता, भूल टेबल में कमी तथा भूजल सिंचाई में गिरावट, ऐसी समस्यायें हैं जिसका सामना कृषि कर रही है। समीक्षा के अनुसार इस क्षेत्र की विकास की रणनीति में भारतीय कृषि में जलवायु परिवर्तन के परिणामों को ध्यान में रखने की जरूरत है।

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