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समलैंगिकों ने की उच्च न्यायालय की सराहना

समलैँगिकता को लेकर विरोधी स्वर उठने शुरू हो गए हैं। वहीं समलैंगिक कार्यकत्ताओं ने इसका भरपूर स्वागत किया है। आठ साल तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले गैर सरकारी संगठन ने समलैंगिकता को वैध बनाए जाने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले की सराहना की है और इसे प्रगतिवादी करार दिया है।
   
अदालत में याचिका दायर करने वाले गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन की संस्थापक अंजलि गोपालन ने कहा कि अब ऐसा लगता है कि हमें 21वीं सदी में हैं क्योंकि अदालत ने समलैंगिकों के अधिकारों को मान्यता दे दी है। यह बहुत ही प्रगतिवादी फैसला है जो समानता के अधिकार को मान्यता देता है। समलैंगिक कार्यकर्ताओं ने धारा 377 के प्रावधानों को कभी पूरी तरह खत्म करने की मांग नहीं की। वे सिर्फ समुदाय को समाज से बाहर किए जाने के खिलाफ लड़े ।
   
एनजीओ की पैरवी करने वाली वकील महक सेठी ने कहा कि हम इसे लेकर रोमांचित हैं कि व्यस्कों के बीच सहमति से बने अप्राकृतिक संबंधों को धारा 377 के दंड प्रावधान से अलग कर दिया गया है। इस बात पर संतोष जहिर किया कि उच्च न्यायालय ने बच्चों को यौन शोषण रोकने के लिए दंड प्रावधानों को बरकरार रखा है ।

अदालत ने जब यह फैसला सुनाया तो सुबह से ही वहां बैठे समलैंगिक कार्यकर्ताओं ने एक दूसरे को अपनी बांहों में लेकर खुशी मनाई। दक्षिण अफ्रीकी निएंके अपनी खुशी को नहीं छिपा सकी और अदालत कक्ष से बाहर निकलते हुए कहा कि यह अदभुत है। आप लोगों भारतीयों ने हमारे दक्षिण अफ्रीकी कानून को अपनाया है जो थोड़ा सा आगे है क्योंकि यह समलैंगिक शादियों को वैध मानता है। शिकागो का समलैंगिक कार्यकर्ता ब्रियान भी इस फैसले को लेकर बेहद खुश था।
   
उच्चतम न्यायालय के वकील और समलैंगिक कार्यकर्ता आदित्य बंधोपाध्याय ने कहा कि यह हमारे लिए उन सभी सिविल अधिकारों के रास्ते खोलता है जिन्हें समलिंगियों, उभयलिंगियों और लिंग परिवर्तन कराने वालों को 160 साल से दिए जाने से इंकार किया जाता रहा है। समलैंगिक कार्यकर्ता और नाज फाउंडेशन के प्रमुख आरिफ जफर ने कहा कि मेरा मानना है कि लंबे इंतजार के बाद यह एक अच्छा समाचार है । बहुत से लोगों के प्रयासों को आखिरकार पुरूस्कार मिल गया । अब पुलिस द्वारा प्रताड़ित और ब्लैकमेलिंग किए जाने के मामले नहीं होंगे ।

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