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जति पंचायत : आदिम सोच, क्रूर फरमान

दोनों खबरें एक ही दिन आईं थीं। एक ख़बर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देवबन्द के फुलास गांव की थी तो दूसरी अयोध्या, फैजाबाद की। 14 जून रविवार को फुलास के आस-पास के आठ गांवों की पंचायत बुलायी गयी थी। पंचायत में चर्चा के बाद फैसला हुआ ‘गांव की कोई भी महिला अकेले गांव से बाहर कदम नहीं रखेगी।

महिला के साथ उसके परिवार का कोई न कोई मर्द होना जरूरी है।’ फरमान लागू करवाने के लिए बाकायदा कमेटियों का गठन किया गया है। दूसरी घटना में 11 साल की कमला को बिरादरी की पंचायत के आदेश पर गिरवी रखा गया, जहां चार महीने तक गिरवी रखनेवाले परिवार के पुरूषों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। विरोध करने पर उसकी पिटाई भी होती रही। इस ‘सज़ा’ की वजह थी कमला के भाई द्वारा गांव की एक लड़की से किया गया प्यार और दोनों का गांव छोड़ कर फरार हो जाना।

पंचायतों के ये दोनों फरमान मध्ययुगीन सोच पर आधारित हैं। लेकिन यहां मुद्दा यह है कि ऐसे गैरकानूनी पंचायतों और पंचजनों को अधिकार और शक्ति कहां से हासिल हो रही है। यदि गांवों में प्रतिरोधी ताकतें भी मौजूद होती तो क्या ऐसी पंचायतों का आयोजन सम्भव हो पाता? इन गांवों और उनके समाज में महिलाओं के लिए बराबरी का हक अभी दूर की बात है। महिलाओं की संगठित ताकत अभी आकार ग्रहण नहीं कर पायी है। फिर सरकार और प्रशासन को इसके बारे में कोई सरोकार नहीं है कि किस तबके का अधिकार कुचला जा रहा है।

समुदाय पंचायतों का काला इतिहास हमारे समाज में बहुत पुराना है और न सिर्फ हमारे देश में बल्कि आस-पास के देशों में भी वह उतना ही बुरा, क्रूर और पिछड़ा है। ऐसी पंचायतें प्रेमियों को पेड़ से लटका देती हैं, पीट कर मार डालती हैं, सज़ा के रूप में महिला से बलात्कार किया जाता है। पाकिस्तान की मुखतरन माई का किस्सा तो काफी चर्चित हो चुका है, जिसका सामूहिक बलात्कार जातिपंचायत के आदेश पर हुआ था। सौ साल से भी पहले बंगाल की शिक्षाशास्त्री और लेखिका रूकैया सखावत हुसैन ने एक फन्तासी लिखी थी जिसका शीर्षक था ‘सुल्ताना का सपना’।

इसमें लेखिका ने एक नयी दुनिया की कल्पना की थी, जिसमें स्त्रियों एवं पुरूषों की भूमिकाओं की अदला-बदली हो गयी है, स्त्रियां नही बल्कि पुरूष दोयम दर्जे की स्थिति में आ गए हैं और वे तमाम काम करने के लिए अभिशप्त हैं, जिन्हें स्त्रियों को अंजाम देना पड़ता है। इस कहानी के जरिए रूकैया ने स्त्रियों की आकांक्षाओं, उम्मीदों को नए पंख दिए थे और पुरूषप्रधान समाज के दोहरे मापदण्डों को बखूबी उजागर किया था।

नैतिकता के सारे मापदंड जो महिलाओं के लिए बनाए गए हैं, वे अगर उन्हीं पर थोपे जाएं तो क्या वजह बताएंगे वे कि उन पर वे नियम लागू नहीं हो सकते! पुरूष होने के नाते उन्होंने क्यों यह छूट ली है कि जो काम औरत के लिए अनैतिक है, वह उनके लिए नहीं है! वे इस प्रश्न का जवाब कैसे दे सकते हैं कि उनके अनैतिक व्यवहार से परिवार की इज्जत क्यों नहीं जाती है ? उनका जवाब यही हो सकता है कि वे पुरूष हैं, लेकिन यह जवाब अब पुराना हो गया है और आधुनिक समाज को इससे इन्कार कर देना चाहिए।

किसी को किसी भी जेंडर या जाति में पैदा होने मात्र से कोई सामाजिक या राजनीतिक या अन्य कोई भी अधिकार स्वत: हासिल नहीं हो जाता है, यही आधुनिक समाज की जनतंत्र आधारित प्रणाली का मूलतत्व है। इसी वजह से दो वयस्क लोगों के जीवन में गैरजरूरी हस्तक्षेप करनेवाली, परम्परा की रक्षा के नाम पर दबी कुचली जातियों के खिलाफ हिंसा को महिमामंडित करनेवाली और अपराधियों को शह देने वाली सामुदायिक पंचायतों, खाप पंचायतें अब बीते जमाने की चीज़ हो गयी हैं। अब वक्त आ गया है कि खाप पंचायतों का गैरकानूनी घोषित किया जाए, जिनमें व्यक्ति के अधिकार, स्त्री-दलित की अस्मिता को कोई सम्मान नहीं है।

दूसरी तरफ महिलाओं को अपने हकों के लिए एकजुट होना होगा, ताकि वे ऐसे स्त्रीद्रोही फरमान को बेअसर कर सकें। वे अकेले पढ़ने, नौकरी करने, घूमने कहीं भी उसी तरह जा सकें जैसे उनके परिवार के पुरूष जाते हैं। वे काफी हद तक इस काम को अंजाम देने भी लगी हैं, लेकिन फिर भी महिलाओं की एक बहुत बड़ी आबादी कभी घोषित कभी अघोषित, अधिकतर जो ख़बरों में आती हैं, ऐसे फरमानों की शिकार बनती हैं। 

लेखिका स्त्री अधिकार संगठन से संबद्घ हैं

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