class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

दरिद्रनारायण की सेवा

दक्षिण के एक मंत्री ने 42 करोड़ का हीरों जड़ा सोने का मुकुट तिरुपति में बालाजी को भेंट किया। यह चुनावी विजय का शुक्राना था या मन्नत पूरी होने की सन्तुष्टि- जो भी हो नारायण इस मुकुट को धारण करके प्रसन्न हुए होंगे। भक्तों का ऐसा ही विश्वास है। इतनी बड़ी राशि के स्वामी की बिसात अरबों की होगी। भारत के असंख्य दरिद्रों को एक जून का खाना मिल जाए तो वे अपनी किस्मत सराहते हैं। ये लोग सर्दी, गर्मी, बरसात- सब मौसमों की क्रूरताओं को नंगे बदन, खुले आसमान या टूटी मढ़ैया में ङोलते हैं। ऐसे देश में भगवान के प्रतीक का श्रृंगार, करोड़ों के मुकुट से करना भक्ति की सीमा में नहीं आता।

माता-पिता को सिंहासन पर बिठाकर दुनिया भर के ऐश्वर्य से लाद दो, पर उनके सामने उनकी सन्तान को भूखा-नंगा रखो तो उनका मन रोएगा या प्रसन्न होगा? सृष्टि के निर्माता को अपने जीवों पर उतनी ही ममता है। सम्पन्न, समृ़द्ध जीव उसके माध्यम हैं। यदि वे अपनी सम्पदा का उपयोग इन अभावग्रस्त लोगों के लिए करते हैं तो वे प्रकारान्तर से प्रभु को ही अर्पित करते हैं।

हनुमान जी पर तेल चढ़ा कर, विशालकाय मूर्तियों का मनों दूध से अभिषेक करके आस्थावान धन्य-धन्य होता है। वही तेल मंदिरों में कीचड़ बनता है, दूध नालियों में बहकर बर्बाद हो जता है। क्या यह तेल किसी गरीब की रसोई में, दूध कुपोषित बच्चों के मुंह में जाकर अधिक सार्थक नहीं होगा? वैसे भी दूध की प्रति व्यक्ति उपलब्धता के मामले में हम काफी पीछे हैं।

हम नए-नए मंदिर-मस्जिद बनाने के लिए जान की बाजी लगा देते हैं। 56 व्यंजनों के भोग लगाते हैं और मंदिरों के बाहर जरूरतमंदों से बेखबर रहते हैं। निदाफाजली के शब्दों में वे हमसे सवाल कर सकते हैं : ‘बच्च बोला देखकर मस्जिदे आलीशान, अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान, अन्दर मूरत पर चढ़े घी पूरी मिष्ठान, मंदिर के बाहर खड़ा ईश्वर मांगे दान।’

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:दरिद्रनारायण की सेवा