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आरक्षण का हाल देखना है तो जरा यहां देखिये

आरक्षण का हाल देखना है तो जरा यहां देखिये

संसद और विधायिकाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का सवाल संसद से लेकर सड़क तक चर्चा में है। आरक्षण के भीतर आरक्षण की बहसबाजी भी जारी है। लेकिन क्या सचमुच आरक्षण से इस मुल्क में महिलाओं की स्थिति में आमूलचूल सुधार आ सकता है और महिला सशक्तिकरण की बातें नारेबाजी से बाहर कोई ठोस व्यावहारिक शकल ले सकती हैं? गम्भीरता से मनन करें, तो एकमुश्त बदलाव की उम्मीद धुंधली दिखती है। खासकर, उस सूरत में जब महिलाओं के लिए पहले से निचले पायदानों पर मौजूद सुविधाओं में सुधार की गुंजाइशें संकुचन का शिकार हों और  पुरुष प्रधान समाज में संसाधनों और साधनों के बंटवारे के प्रति सामाजिक नजरिये में अपेक्षित उदारता न नजर आती हो।

कनॉट प्लेस के पास शिवाजी ब्रिज रेलवे स्टेशन पर लोकल ट्रेन पकड़ने के लिए मौजूद भीड़ में नियमित सफर करने वाली महिलाओं की तादाद, घर की चारदीवारी से बाहर आकर विस्तृत समाज में स्त्रियों के सशक्तिकरण का एहसास दिलाती है। लेकिन साथ ही अपने पीछे समाज में महिला की समान दावेदारी पर सवालिया निशान भी लगाती है। ट्रेन में महिलाओं के लिए तीन महिला आरक्षित कोच हैं, जो दफ्तर आते-जाते समय काम काजी महिलाओं से ठसाठस भरे होते हैं। कई बार तो इन कोचों में कुछ पुरुष भी चढ़ने से गुरेज नहीं करते। ट्रेन में सफर करने वाली महिलाएं और लड़कियां आरक्षित कोच को बहुत लाभप्रद समझती हैं। उन्हें लगता है महिलाओं को उचित सुविधाएं और सुरक्षा दी जाएं तो वे और सशक्त हो सकती हैं। अधिक संख्या में आगे आ सकती हैं। 

शिवाजी ब्रिज रेलवे स्टेशन पर शकूरबस्ती से पलवल जाने वाली ट्रेन की यात्री मिसेज आहूजा पिछले दस वर्षो से ट्रेन से दफ्तर आती-जाती हैं। वह बताती हैं- ट्रेन में महिला आरक्षित कोच हैं, मैं आराम से कीर्तन-भजन करते हुए घर तक फरीदाबाद पहुंच जाती हूं। बस में धक्के-मुक्के खाते रहने के बजाय ट्रेन में तो हम महिला आरक्षित कोच में पूरे अधिकार के साथ सफर करती हैं।  बस में मुश्किल से आठ सीटें महिला आरक्षित होती हैं। उन पर भी कई बार कुछ खरदिमाग पुरुष बैठ जाते हैं। सीट से उठने के बजाय बहस करने लगते हैं। पढ़ी-लिखी महिलाएं तो तब भी कंडक्टर से शिकायत कर या फिर आपस में दो-तीन महिलाएं उस पुरुष को ताने मारकर शर्मिंदा होकर खड़े होने का मजबूर कर देती हैं। लेकिन गांव और दूर -दराज से आई अशिक्षित महिला गोदी में बच्चा लेकर चुपचाप खड़ी ही रह जाती हैं। न तो उन्हें कोई जानकारी ही होती है कि हिम्मत से कह सकें कि यह सीट महिला आरक्षित है। अशिक्षित होने के कारण उनमें इतना आत्मबल भी नहीं होता कि वह विरोध में कुछ भी कह सकें। बस चुपचाप खड़ी ही रह जाती हैं, जब तक कोई महिला ही उससे सहानुभूति न दिखाए। या फिर कंडक्टर ही जब तक महिला का पक्ष न ले।

वास्तव में महिला अधिकारों और महिलाओं की सुविधा को लेकर बसों में होने वाली बहस, पिछले 14 सालों से  राजनैतिक दलों के बीच महिला आरक्षण विधेयक पर हो रही बयानबाजी से मेल खाता है। क्योंकि दोनों ही जगह महिला सशक्तीकरण का उद्देश्य राजनैतिक ताने-बाने के बीच घिरा है। यहां सवाल बस में उपलब्ध आरक्षित सीटों का नहीं, बल्कि उस संदेश का है, जिसके निहितार्थ महिलाओं के प्रति समाज के उदार नजरिये और उन्हें दी जाने वाली प्राथमिकता में दर्ज हैं। बस में महिला के द्वारा महिला का पक्ष लेने का उदाहरण,संसद में आरक्षण से पहुंची सशक्त महिलाओं के द्वारा समाज की मजबूर और अबला महिलाओं के हितों में पक्ष लेने के समानान्तर है। मिसेस आहूजा का यह भी कहना था कि बस में महिला आरक्षित आठ सीटों के बजाय अन्य बची हुई सीटों पर क्या कभी महिला को बैठे देखा है?

आज जबकि प्रतिदिन महिलाएं अधिक से अधिक आत्मनिर्भर हो रही हों और समाज में अपनी भूमिका बनाना चाहती हों तो समाज की जवाबदेही भी आप ही बढम् जाती है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा हो रहा है? अनेक महिलाएं घर की आर्थिक परेशानियों के कारण दो जून की रोटी के जुगाड़ में दूर-दूर जाकर काम करती हैं। फैक्ट्रियों, दुकानों और घरों में चूल्हा-चौके से लेकर झाडू-पोंछा तक करती हैं। कई ऐसी हैं, जो सड़को-पटरियों पर बैठकर छिटपुट सामान बेचती हैं। उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि कहां आरक्षण है कितना है, बस में है या फिर संसद में। रोजी-रोटी नसीब हो जाए, इसे ही सौभाग्य समझती हैं।

उस रोज आरक्षित कोच में मिसेज आहूजा के साथ सफर करते हुए तिलक ब्रिज हाल्ट पर ग्रामीण परिवेश के कपड़े घाघरा-चोली पहने चार-पांच महिला चढ़ी। उनकी उम्र 25-26 रही होगी। आठ-नौ बच्चे उनके साथ थे। अगले स्टेशन निजाम्मुद्दीन पर कुछ भद्र महिलाएं चढ़ती हैं। भद्र महिलाओं से जब उन ग्रामीण परिवेश और पिछड़ी जाति की महिलाओं से सामना हुआ तो बात यूं बढ़ी- थोड़ा सरक कर बैठ जा। बच्चे को नीचे खड़ा कर दे। हम कहां बैठेंगे! टिकट लिया है तूने जो इतने शान से बैठी है? ग्रामीण महिला चुप-चाप घूरती रही। तभी पहले से दूसरी सीट पर बैठी सरिता जी कहती हैं, कोई बात नहीं मंजुला जी, आप यहां मेरे साथ एडजेस्ट हो जाइए। वास्तव में समाज में कदम-कदम पर दिखलाई पड़ने वाली मंजुला जैसे किरदार भले ही सामान्य से लगते हों, लेकिन वंचितों की बात करने वालों का महिला आरक्षण विधेयक के वर्तमान स्वरूप से विरोध की बात समझ में आती है। यह डर उचित लगता है कि कहीं केवल सशक्त महिलाएं ही सीट पर काबिज होने को आतुर दिखें और हाशिए पर खड़ी निरीह महिला चुपचाप हेकड़ी सहन करती रहे।

 

 

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