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क्योंकि ये सरकारी वन्य प्राणी हैं

चिड़ियाघर में वन्य प्राणियों के दिन अब फिर गए हैं। क्योंकि पेय जल संकट के हल के लिए विभाग ने उनके लिए एक हजार लीटर पानी की क्षमता वाली 40 टंकियां लगवा दी हैं, जिनमें सप्ताह भर का पेय जल उपलब्ध रहेगा। खुशनसीब हैं वे जन्तु। फिर भी शहरों में अधिकांश पंछी तो प्यासे ही हैं। जिसमें ठेलों-टेंपो में लदी मुर्गियां, जिन्हें अपने फ्यूचर का पता नहीं। ज्योतिषी के पिंजड़ों का तोता या मैना जिन्हें शायद ही समय पर जल पीने को मिलता हो। चौराहों पर बिकने वाले पिल्ले, कबूतर, तोते भी अपने पिंजड़ों में प्यासे ही दिखाई पड़ते हैं। मंडियों में, हाट में बिकने वाले जानवर भैंस, बकरी, ऊंट, गाय के लिए पानी का कोई भी स्पेशल इंतजाम नहीं है। कहीं-कहीं तो सड़कों के किनारे पुण्य कमाने के लिए रखे पानी के टब भी खाली पड़े होते हैं।

राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

विज्ञापन के बहाने जनसंदेश भी

बाजारवाद के बढ़ते इस प्रतिस्पर्धात्मक दौर में हर वस्तु का मापदंड, सर्वप्रथम उसके सटीक विज्ञापन पर निर्भर करता है कि अमुक वस्तु को कितने प्रभावी ढंग से बाजार में उतारा गया है। किंतु इसके साथ-साथ यदि उस विज्ञापन में सकारात्मक जनसंदेश का भी प्रचार-प्रसार हो तो एक पंथ दो काज वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। ऐसा ही विज्ञापन एक मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी में देखने को मिलता है। एक युवा नेता जब संसद भवन पहुंचते हैं, तब उनके पिता द्वारा मोबाइल द्वारा पूरे जनसमूह के आवाज की गूंज सुनाना और उन्हें उनके लोक प्रतिनिधित्व का ध्यान कराना वाकई में एक मार्मिक विज्ञापन है।

रवि गुप्ता, सेक्टर-6, नोएडा

चौबे जी कर रहे रखवाली

राजनगर-कक, एच ब्लॉक, पालम कॉलोनी में पानी की सप्लाई ट्यूबवेलों से होती है। लाइनों में कई जगह पानी बंद करने व खुलवाने के लिए वॉल्व लगे हैं, जिनकी चाबी क्षेत्रीय अभियंता ने कुछ लोगों को दे रखी है, जो अपनी मर्जी से पानी रोक देते हैं। सर छोटूराम मार्ग राजनगर- कक, पर वॉल्व की चाभी भी इसी प्रकार एक व्यक्ति के पास है, जो पानी अपनी मर्जी से खोलता है। इस कारण गली नम्बर-11 से गली नम्बर 6 तक पिछले एक सप्ताह से लोग निजी टैंकरों से बोरिंग का गंदा पानी पीने को बाध्य हैं।

विजय वर्मा, पालम कॉलोनी, नई दिल्ली

हाईटेक हैं पर हवादार नहीं

डीटीसी द्वारा जो नई हरी हाईटेक बसें दिल्ली में चलाई ज रही हैं, ये पूर्णतः मुसीबत का सबब बन गई हैं। ये महंगी बसें देखने में काफी आकर्षक हैं, मगर सुविधाओं के नाम पर पूर्णतः शून्य। दिल्ली की बसों में यात्रियों को ठीक से खड़े होने के लिए पर्याप्त स्पेस नहीं है। बसों की खिड़कियों के शीशे बड़े हैं, पर पूरी तरह नहीं खुलते, जिससे हवा नहीं आती। जब दोनों गेट बंद हो जाते हैं तो इस भीषण गर्मी में घुटन होने लगती है, जिसमें यात्रा करना बड़ा कष्टकर हो जाता है।

राजेन्द्र सिंह रावत, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली

एक मजाक ही तो है

महंगाई दर तो लगातार कम हो रही है पर एक गरीब के लिए महंगाई जस की तस बनी हुई है। क्योंकि मंदी के कारण आय भी कम हुई है और दो वक्त की रोटी जुटा पाना भी भीषण समस्या बन गया है। सब्जियों के दाम, महंगाई दर कम होने पर भी आसमान छू रहे हैं, वहीं दाल-आटे के भाव भी कम नहीं हैं। ऐसे में यदि ये कहें कि महंगाई दर में कमी महंगाई कम कर रही है तो शायद इससे बड़ा मजाक कोई और नहीं होगा।

आरती टैगोर, जामिया, नई दिल्ली

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