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इम्तिहान और भी हैं बोर्ड के सिवा

हमारे नये शिक्षामंत्री कपिल सिब्बल ने आने वाले सौ दिनों की अपनी कार्यसूची का ऐलान कर दिया है। उन्होंने यह बात भी साफ की है कि यशपाल आयोग की बहुत सारी सिफारिशों पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है और इन्हें यथाशीघ्र लागू करने के बारे में सोच रही है। जिस घोषणा ने विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के मन में सबसे ज्यादा उत्साह जगाया है, वह यह है कि दसवीं की परीक्षा को बोर्ड की बेड़ियों से छुटकारा दिलाया जायेगा। लम्बे समय से अपने देश में यह बहस जारी है कि बोर्ड की परीक्षाओं के दबाव के कारण किशोर छात्र-छात्राएं घनघोर मानसिक दवाब में रहते हैं और कुछ मासूम आत्महत्या तक के लिए मजबूर हो जाते है। निरन्तर बढ़ते बस्ते के बोझ का भी जिक्र होता रहा है। प्रोफेसर यशपाल इस रिपोर्ट के पहले भी यह सुझाव कई बार दे चुके हैं कि बोर्ड परीक्षाओं के खौफ से छात्रों को मुक्ति मिलनी चाहिए और बस्ता हल्का होना चाहिए। इन सिफारिशों के आधार पर देश के कई राज्यों में पांचवी और आठवीं की परीक्षा को बोर्ड के नियंत्रण से बाहर कर दिया गया है और स्कूलों को यह हिदायत दी गई है कि कमजोर छात्रों को भी अगली कक्षा में दसवीं तक प्रोमोट कर दिया जाय। हालांकि अभी भी कई जगह दसवीं से पहले भी बोर्ड की परीक्षाएं हैं और सभी छात्र प्रोमोशन के मामले में समान रूप से भाग्यशाली नहीं होते। इस बात की अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि अधिकांश छात्र गणित, विज्ञान और अंग्रेजी में ही फेल होते हैं और इन्हीं विषय पिशाचों से घबराकर अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ देते हैं। यह बात भी याद रखने लायक है कि अगर कम उम्र के विद्यार्थी के मन में गणित और अंग्रेजी का खौफ पैदा न किया जाए तो मुनाफाखोर ट्यूशन करने वाले टीचरों का धंधा ही चौपट हो जाएगा। यह बात सरकारी स्कूलों पर ही नहीं, मशहूर पब्लिक स्कूलों पर भी समान रूप से लागू होती है।

इतनी ही महत्वपूर्ण बात यह समझना है कि कॉलेज में दाखिला हो या इंजीनियरिंग या डॉक्टरी की पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षा के लिए कोचिंग करवाने वाले संस्थान तक अपने यहां भर्ती के पहले बोर्ड की परीक्षा में प्राप्त नंबरों को महत्वपूर्ण समझते हैं। इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए भी बारहवीं वाली बोर्ड की परीक्षा में उत्तीर्ण होना अनिवार्य समझा जाता है। कुछ व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए दसवीं की बोर्ड परीक्षा की वतरणी को पार किये बिना काम नहीं चलता। इस हालत में यह सोच पाना कठिन है कि कैसे देश भर में दसवीं के बोर्ड का संत्रास समाप्त किया जा सकेगा।

हमारा सरदर्द कुछ बुनियादी सवालों को लेकर है। आधुनिक जिंदगी में हर कदम पर पल-पल हमें किसी न किसी इम्तिहान का सामना करना होता है। प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता का यह आलम है कि एक-दो अंक से पीछे रहने वाला ही जिंदगी की दौड़ में हमेशा के लिए पिछड़ जाता है। ऐसे में समझदारी इसी में है कि अपनी संतानों को इम्तिहान के लिए तैयारी के सही तरीके समझाए जाएं। अगर उनमें यह मानसिकता शुरू से ही घर करने लगेगी कि बिना किसी कठिन परीक्षा के भी आगे बढ़ा जा सकता है, तब यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि वह काम लायक कुछ भी, कभी भी, किसी से सीख पाएंगे। कोई भी व्यक्ति बच्चा हो या बूढ़ा सफलता के साथ-साथ असफलता से भी बहुत कुछ सीखता है। वह मुहावरा बड़े काम का है कि ठोकर खाने के बाद संभलने वाला बार-बार नहीं लड़खड़ाता। मान लीजिए दसवीं की बोर्ड वाली परीक्षा सर्वसहमति से समाप्त कर भी दी जाती है तो क्या आप मा के लाडले और पिता की लाडली को बिगड़ने से बचा लेंगे। क्या यह भरोसा हरेक को दिलाया जा सकता है कि अब पक्का है इसके बाद कोई इम्तिहान न हो? हक़ीकत यह है कि आप चाहे इसे कड़वा सच कहें या अस्तित्व बचाए रखने का संघर्ष, आज की दुनिया में कहीं भी ‘ये इल्म नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’

गुत्थी काफी उलझी हुई है। शिक्षा संघीय राजनैतिक प्रणाली में राज्यों के कार्याधिकार क्षेत्र में आती है। इतना ही नहीं पिछले दो दशकों में कभी भगवा ध्वजधारी हिन्दुत्ववादी कट्टर राष्ट्र प्रेमियों ने तो कभी प्रगतिशील आधुनिक छद्म धर्मनिरपेक्षता के संरक्षकों ने स्कूली पाठच्यक्रम के साथ भयंकर अत्याचार में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आज भी देश के विभिन्न राज्यों में एक ही पार्टी का शासन नहीं। राष्ट्रीय स्तर पर एक अखिल भारतीय पाठ्यक्रम पर सर्वसहमति आसान नहीं होगी। विविधता और प्रादेशिक स्वाधीनता को बचाए रखने के नाम पर तरह-तरह के गतिरोध अभी से सामने आने लगे है। कुछ पत्रकारों ने तो यहां तक सुझव दे डाला है कि प्रधानमंत्री को कपिल सिब्बल जैसे उतावले मंत्रियों पर अकुंश लगाना चाहिए। आरंभ में भाजपा के कुछ युवा नेताओं ने कपिल सिब्बल के वक्तव्यों का स्वागत किया पर अपनी आलाकमान के तेवर देखने के बाद उनकी बोलती बंद हो चुकी है। जहा तक वामपंथियों का प्रश्न है, वह निजीकरण और शिक्षा के व्यवसायीकरण की बेमतलब बहस में ही उलझे हैं।

भूंमडलीकरण के इस दौर में जब हमारी सरकार बेहिचक बेरोक-टोक दूरसंचार से लेकर वित्तीय क्षेत्र और स्वास्थ्य सेवा आदि में पूंजीपति, उद्यमियों और विदेशी निवेशकों को प्रोत्साहित कर रही है, यह सोचना कठिन है कि शिक्षा को एक जनहितकारी मिशन के रूप में बचाए रखा जा सकता है।

जिस बात के लिए लड़ाई लड़ी जानी चाहिए और जिस मुद्दे पर किसी समझोते समर्पण की गुंजाइश नहीं हो सकती, वह है कि पढ़ाई के क्षेत्र में प्राथमिक पाठशाला से लेकर विश्वविद्यालय तक दाखिले प्रतिभा के आधार पर होने चाहिए और आर्थिक साधनों के अभाव में किसी भी गुदड़ी के लाल को अवसर की समानता से वंचित नहीं रखा जाना चाहिए। सामाजिक न्याय के नाम पर सिर्फ जाति के आधार पर राजनीतिक रूप से उपयोगी आरक्षण से यह बात सुनिश्चत नहीं की जा सकती। जब तक देश में अमीरों और समर्थों के लिए बेहतर स्कूल और बचे-खुचों के लिए बदतर स्कूल बचे रहेगें, तब तक शिक्षा में सुधार की बात करना बेमानी है। यशपाल आयोग की सिफारिशें दसवीं की बोर्ड परीक्षा तक सीमित नहीं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा एआईटीईसी तथा मेडिकल बार काउंसिल के बारे में भी बहुत महत्वपूर्ण सुझव प्रोफेसर यशपाल ने दिये हैं।

अभी भी सिब्बल साहब ने यह कहना शुरू कर दिया है कि सरकार के लिए यशपाल आयोग की सभी सिफारिशें स्वीकार करना जरूरी नहीं। अर्थात् जो कुछ शुरू में वाहवाही लूटने के बाद सरकार के लिए सहूलियत का रास्ता होगा, उसी पर यह महाजन चलेंगे।

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लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

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