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ब्लॉग वार्ताः सुना नहीं जाता भोजपुरी गाना

भोजपुरी गानों की बाढ़ है। बिहार, यूपी से लेकर मुंबई तक सस्ती सीडी क्रांति ने भोजपुरी गानों के ऐसे म्यूजिक वीडियो पैदा किये हैं, जिनके स्तर को लेकर सोचने का समय आ गया है। सेक्स को लेकर जिस तरह का भौंडापन इन गानों में झलक रहा है, साफ है कि भोजपुरी में मजाक या गाली देने की परंपरा का सीमा से बाहर जाकर इस्तेमाल हो रहा है।

इस पर बहस होनी चाहिए। नई सोच नाम के ब्लॉग पर दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया के एमसीआरसी के दो छात्रों ने शुरूआत की है।

http://naisoch.blogspot.com  क्लिक करते ही गंगा मइया तोहे पीयरी चढ़इबो और सजनवा बैरी भईले हमार जैसी फिल्मों का जिक्र है। जिनके गाने भोजपुरी को हिंदी फिल्मों के गानों की बराबरी पर आ खड़े होते हैं। 1961 से लेकर 73 तक भोजपुरी का दौर शानदार रहा है।

सन् 61 में ही आई थी गंगा मइया तोहे पीयरी चढ़इबो। यू ट्यूब पर जाकर इसका वीडियो देख रहा था। बनारस की गंगा पूरे शबाब पर नजर आती है। फिल्म में पचासों नाव हैं। हवा तेज चल रही है। लहरें उठ रही हैं। आज बनारस की गंगा को देख कर लगता है कि जब गंगा ही नहीं रही तो भोजपुरी गानों की मिठास कैसे बचेगी।

टी. सीरीज ने जब शारदा सिन्हा जैसी मीठी और बालेश्वर जैसा खरा-खरा गाने वाले को आगे बढ़ाया तो अस्सी के दशक में हिंदी के सुपरहिट गानों को बिहार में लोकप्रिय होने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती थी। उमेश पंत और रोहित वत्स का यह लेख बताता है कि कैसे मनोज तिवारी, भरत शर्मा व्यास, निरहुवा, गुड्डू रंगीला, छैला बिहारी और कल्पना के आने से सब कुछ बदल जाता है। भोजपुरी का बाजार 800 करोड़ का बताया जाने लगा है।

और इसी बाजार को हड़पने के सिलसिले में भोजपुरी अश्लील होती चली गई। उमेश कहते हैं कि कैफी आजमी, जेपी और बिस्मिल्लाह खान जैसे लोगों की भाषा रही है भोजपुरी। लेकिन इन अश्लील गानों ने भोजपुरी को दुनिया से काट दिया है। ये गाने अब सिर्फ भोजपुरी भाषियों के बीच भी सुने जाते हैं।

एक जमाना था जब शारदा सिन्हा के गीत बजते थे तो आस-पास का माहौल खुशनुमा हो जाता था। ले ले अइह हो पिया सेनुर बंगाल से या फिर कोयल बिन बगिया न शोभे राजा।

अब तो भोजपुरी के गाने जीजा-साली संवाद की आड़ में अपनी परंपरा की तिलांजलि दे रहे हैं। ठीक है कि लोग भी इन गानों को सुन रहे हैं। लेकिन अब भोजपुरी को वाकई इंतजार है अच्छे गानों का।

http://www.lavanyashah.com क्लिक करते ही भोजपुरी फिल्मों की एक सुपर स्टार पद्मा खन्ना का जिक्र मिलता है। गंगा मइया तोहे पीयरी चढ़इबो से पद्मा खन्ना हिट हुईं थीं। जॉनी मेरा नाम से लेकर अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का मौका मिला। पद्मा खन्ना आजकल अमेरिका के न्यू जर्सी शहर में रहती हैं। वहां बच्चों को शास्त्रीय नृत्य सिखाती हैं। आज भोजपुरी के स्टार भोजपुरी से आगे नहीं जा पा रहे। रवि किशन और मनोज भले ही सुपर स्टार हैं मगर सिर्फ भोजपुरी के। भोजपुरी और हिंदी का लिंक टूट गया है। महुआ और हमार भोजपुरी के अपने न्यूज चैनल हैं।

खराब प्रोडक्शन ही सही लेकिन बलिया क्रांति पर बन रही डॉक्यूमेंट्री इसी जरूरत की ओर इशारा कर रही है कि एक बार फिर से अपनी कथाओं को कहने और सुनाने के लिए इन चैनलों की जरूरत है। महुआ की न्यूज एंकर पेशेवर अंदाज में तो पढ़ते हैं, लेकिन उन्हें हिंदी और भोजपुरी के बंबइया मिश्रण की आदत से निकलना होगा। नई भोजपुरी गढ़नी होगी।

युवा ब्लॉग पर एक लेख देखकर ठहर गया। क्लिक करते ही एक ऐलान मिला कि हिंदी में अब दो ही स रहेंगे। ष का वजूद खत्म हो जाएगा। ब्लॉगर लिखते हैं कि एनसीईआरटी में ष की जगह श लिखने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। केंद्रीय हिंदी संस्थान में वर्तनी में बदलाव पर काम हो रहा है।

1942 के बाद से वर्तनी के मानक में बदलाव नहीं आया है। न्यूज रूम में हम व्याकरणाचार्यों के साथ झगड़ते ही रहते हैं कि अमेरिका लिखें कि अमरीका लिखें।

अंत में संपादक के फैसले से तय होता है। शब्दों की हैसियत संपादक के सामने पता चलती है।

पर किसी वर्ण के गायब हो जाने पर दुख नहीं होना चाहिए। न्यूज चैनलों और अखबारों से व्याकरण के जाने के बाद वर्ण भी चले गए तो राम जाने क्या होगा। जैक्सन नहीं रहे की जगह लोग नहीं रहे जैक्सन लिखने लगे हैं। क्रिया पहले संज्ञा बाद में। भाषा बदली है। हर दिन बदल रही है। यह जैसे बन रही है वैसे बनने देना चाहिए।

रवीश कुमार
ravish@ndtv.com
लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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