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अनजान हस्तियों ने रचा चुटकुलों का संसार

अनजान हस्तियों ने रचा चुटकुलों का संसार

जीवन की तमाम परेशानियों के बीच हम कुछ खोते जा रहे हैं और शायद यह भूल गये हैं कि दिल खोलकर हंस लेने से चाहे कुछ समय के लिये ही सही हम इन परेशानियों से निजात पा सकते हैं। ऐसी हंसी में चुटकुलों का बहुत योगदान होता है और इसी सिलसिले में हर वर्ष एक जुलाई को मनाया जाता है, अंतरराष्ट्रीय जोक डे।

जाने-माने हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा कहते हैं कि चुटकुले कहां से पैदा होते हैं, यह किसी को नहीं मालूम। ऐसे पता नहीं कितने अनजान लोग हैं, जिन्होंने चुटकुलों के आस्तित्व को जिंदा रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह दिवस ऐसे लोगों को समर्पित होना चाहिए।

राजधानी दिल्ली के एक पार्क में रोज शाम को लाफ्टर थेरेपी अपनाने वाले देवी सिंह कहते हैं, मैं और मेरे जैसे कई बुजुर्ग रोज शाम को पार्क में इकट्ठे होकर व्यायाम करते हैं और चुटकुले सुनाकर एक दूसरे को हंसाते हैं। इससे हमारा व्यायाम भी हो जाता है और दिन भर का तनाव भी दूर हो जाता है।

रोहिणी के डिस्ट्रिक्ट पार्क में महिलाओं के लाफ्टर गैंग की सदस्य सुभाषिनी वर्मा कहती हैं कि जोक डे तो मैं नहीं जानती पर जहां तक हंसने-हंसाने की बात है तो ऑफिस और घर की जिम्मेदारियों में अपने लिए वक्त ही नहीं बच पाता इसलिए पार्क में सवेरे साढ़े पांच बजे आकर महिलाओं के साथ कुछ देर बैठती हूं । सब महिलाएं अपनी पसंद के हिसाब से कुछ देर गुनगुनाती हैं और फिर लाफ्टर थैरेपी लेते हैं । इससे शरीर को सारे दिन के ऑक्सीजन और जोश की खुराक मिल जाती है।

सिंह कहते हैं कि चुटकुले सुनना सुनाना सिर्फ हंसने ही नहीं बल्कि समाज के लोगों को आपस में जोड़े रखने का भी एक माध्यम है । सोने से पहले आस पड़ोस के लोग मिल बैठते थे और अक्सर चुटकुले सुनाकर खुशियां बांटा करते थे, लेकिन अब आधुनिकता की आंधी में वह सब बातें उड़ चुकी हैं।

आजकल टेलिविजन पर प्रसारित होने वाले हास्य कार्यक्रमों से बेहद खिन्न सिंह का कहना है कि आजकल चुटकुलों के नाम पर अश्लीलता परोसी जा रही है। कोई भी शालीन व्यक्ति अपने परिवार के साथ बैठकर इन कार्यक्रमों को नहीं देख सकता। उन्होंने सरकार से ऐसे कार्यक्रमों पर अंकुश लगाने की मांग की।

वैसे लोगों में चुटकुले सुनने-सुनाने के शौक का एक व्यवसायिक पहलू भी है। मिल बैठकर चुटकुले सुनाने का चलन कम होने का फायदा उठाते हुए मोबाइल कंपनियां महीने के कुछ रुपयों की एवज में रोज अपने ग्राहकों को चुटकुले भेज अपनी कमाई करती हैं। कई वेबसाइट चुटकुलों के माध्यम से बड़ा कारोबार कर रहीं हैं। चुटकुलों की किताबें भी हर जगह उपलब्ध हैं।

कुल मिलाकर चुटकुले बहुत पहले से हमारे समाज का हिस्सा रहे हैं और यह संभव है कि मानव सभ्यता तक यह हमारे बीच अपना महत्व बनाए रखेंगे। यह जरूर है कि पहले यह लोगों के मिलने पर खुशियां बांटने का साधन मात्र थे, लेकिन आज इस साधन ने व्यापक रूप धारण कर लिया है। जाने अनजाने हम सभी चुटकुलों से रोज रूबरू होते है, लेकिन आधुनिकीकरण के इस बदलते रूप ने चुटकुलों के प्रसार का रूप भी बदल के रख दिया है।

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