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दो टूक

नीति कहती है कि प्रशंसकों को भले छोड़ दें, पर निंदकों को जरूर साथ रखें। लोकतंत्र की पक्ष-विपक्ष वाली राजनीति में तो आलोचकों की और भी सार्थक भूमिका है। लेकिन दिल्ली सरकार की चाल अलबेली है। उसने बिजली संकट पर विधायकों की बैठक बुलाई और विपक्ष को पूछा तक नहीं!

इस पर विधानसभा में सोमवार को दिन भर हंगामा रहा। सवाल है कि कांग्रेसियों को डर  क्या था? अंदरूनी फजीते जगजहिर होने का? या बिजली पर कमजोर होमवर्क की कलई खुलने का? राजधानी में हाहाकार मचाने वाला यह मुद्दा क्या एक सर्वदलीय बैठक का हकदार नहीं? क्या इतने संवेदनशील इश्यू पर पक्ष-विपक्ष का भेद शोभा देता है? क्या कभी किसी रोज सियासतदानों को सियासत से ऊपर उठकर नहीं सोचना चाहिए?

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