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नाभिकीय पाकिस्तान और उसके असंतोष

पाकिस्तान में ऐसी सरकार है, जो अपनी जमीन के बड़े हिस्से को नियंत्रित नहीं कर पा रही, जिसकी सेना बिखरी हुई है, जिसका नाभिकीय हथियारों पर नियंत्रण जता रहा है और जहां के इस्लामी उग्रवादी जनसंहार के हथियारों को हासिल करने का इरादा पाले हुए हैं।

कम से कम पश्चिमी देश पाकिस्तान के बारे में ऐसी ही दु:स्वप्न भरी कल्पना करते हैं। पाकिस्तान की मौजूदा उथल-पुथल से पश्चिमी देश सिहर रहे हैं, क्योंकि वे जिस दु:स्वप्न की कल्पना कर रहे हैं, वह घटित होने वाला लग रहा है। देश का तालिबानीकरण जिस गति से हो रहा है, उसके चलते वह बिखरने के कगार पर आ चुका है।

बराक ओबामा भी इस पर चिंता जता चुके हैं, पर उन्होंने यह विश्वास भी जताया है कि पाकिस्तान के नाभिकीय हथियार उग्रवादियों के हाथ में नहीं पड़ेंगे। इसी तरह की आशंका पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने एक बार फिर जताई है, हालांकि साथ में यह भी कहा है कि अभी वे सुरक्षित हाथों में हैं।

अमेरिका और पश्चिमी देश लंबे समय तक दक्षिण एशिया में नाभिकीय हथियारों को बड़े खतरे के रूप में देखते रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह आशंका रही है कि भारत और पाकिस्तान के बीच का पारंपरिक युद्ध नाभिकीय युद्ध में बदल सकता है। बिल क्लिंटन ने कश्मीर विवाद को दुनिया का सबसे खतरनाक विवाद बताते हुए कहा था कि इससे इस उपमहाद्वीप में नाभिकीय विनाश होने का डर है।

दूसरी तरफ भारतीय और पाकिस्तानी अधिकारी यह दलील देते रहे कि जिस प्रकार शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बना पारस्परिक विनाश का खतरा एक प्रकार की असहज शांति में परिवर्तित हो गया, उसी तरह दक्षिण एशिया के नाभिकीय हथियारों का एक तरह से स्थिरता प्रदान करने वाला असर होगा। उनका कहना है कि टकराव की कई स्थितियां आईं, पर भारत और पाकिस्तान ने अपने विवादों पर काबू रखते हुए तार्किक ढंग से ही व्यवहार किया।

लेकिन 11 सितंबर 2001 के बाद पश्चिमी देशों की नजर में अब अलग तरह की समस्या उत्पन्न हो गई है। उन्हें डर है कि अगर इस्लामी उग्रवादियों के हाथ में  पाकिस्तान के परमाणु हथियार आए तो वे इसका इस्तेमाल पश्चिम के खिलाफ कर सकते हैं। इस बात की कम ही उम्मीद है कि तार्किक सरकारों के मॉडल पर आधारित नाभिकीय प्रतिरोध का शास्त्रिय सिद्धांत इस्लामी उग्रवादी समूहों पर उसी तरह से लागू होगा, जिस तरह से पाकिस्तान सरकार पर लागू होता है।

पाकिस्तान के नाभिकीय कमान और नियंत्रण व्यवस्था की स्थापना 2000 में हुई और वह नेशनल कमान अथॉरिटी में केंद्रित है। इस अथॉरिटी में रोजगार नियंत्रण समिति, विकास नियंत्रण समिति और रणनीतिक योजना समिति के साथ देश के सैनिक अधिकारियों का एक छोटा सा समूह है, जिसकी देश के नाभिकीय हथियारों तक पहुंच है।

हालांकि इस कमान और नियंत्रण व्यवस्था में कुछ बुनियादी खामियां हैं और वो यह हैं कि पाकिस्तान की सेना देश के नाभिकीय हथियारों का नियंत्रण नागरिक नेतृत्व को देने को तैयार नहीं है। यहां यह बात ध्यान देने की है कि दुनिया में जितने नाभिकीय राज्य हैं, उनमें पाकिस्तान ही ऐसा राज्य है, जहां की नाभिकीय बटन सेना के नियंत्रण में है।

यह जानना कतई सुखद नहीं है कि बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ जैसे पूर्व प्रधानमंत्रियों ने यह स्पष्ट किया था कि तमाम तरह के संकट जब चरम पर थे तब भी पाकिस्तान की सेना ने नाभिकीय हथियारों के इस्तेमाल के निर्णय करने के दायरे से नागरिक नेतृत्व को बाहर ही रखा। इसके अलावा यह भी देखने लायक है कि इन हथियारों के लिए जवाबदेह वरिष्ठ नागरिक और प्रशासनिक अधिकारियों ने नियंत्रण का काम ठीक तरह से नहीं किया है।

पाकिस्तान के नाभिकीय कार्यक्रम के प्रमुख (और राष्ट्रीय नायक रहे) ए. क्यू. खान पाकिस्तान को सबसे बड़े नाभिकीय प्रसार का केंद्र बनाने में सहायक भी रहे। उन्होंने दूरदराज स्थित और जिन तमाम देशों को एटमी प्रौद्योगिकी लीक की, उनमें ईरान, उत्तर कोरिया और लीबिया शामिल हैं। इतना ही नहीं ओसामा बिन लादेन के बुलावे पर पाकिस्तान के एटमी वैज्ञानिक अफगानिस्तान की यात्रा पर भी गए।

हालांकि यह सही है कि पाकिस्तान की सेना ही इस समय देश में सबसे संगठित और प्रोफेशनल शक्ति है, पर यह नहीं स्पष्ट है कि क्या उग्रवादियों की बढ़ती पकड़ और संस्थागत सुरक्षा व्यवस्था की गैर मौजूदगी में सेना नाभिकीय हथियारों पर अपना नियंत्रण कायम रख सकेगी?  पाकिस्तानी सेना के हौसले बुरी तरह से पस्त हो रहे हैं। सैनिक उग्रवादियों से लड़ने के बजाय उनके सामने बड़ी संख्या में हथियार डाल रहे हैं।

पाकिस्तानी सेना की वफादारी बिखरती हुई दिखाई दे रही है, जिसके तहत उसकी सांगठनिक व्यवस्था को खतरा है। पाकिस्तानी सेना के युवा अधिकारियों के बढ़ते इस्लामीकरण के विधिवत प्रमाण हैं और पाकिस्तानी सेना, खुफिया सेवाओं और आतंकी समूहों के बीच जिस तरह के संबंध हैं, उसे देखते हुए यह खतरा बना हुआ है कि पाक सेना और उसकी गुप्तचर सेवा के रेडिकल इस्लामी समूहों के साथ विधिवत गठबंधन कायम हो जाएं।

पाकिस्तान ने 11 सितंबर 2001 के बाद अपने नाभिकीय हथियारों के नियंत्रण की व्यवस्था कायम करने और उसकी चोरी रोकने के लिए अमेरिकी मदद ली। बताया जता है कि अमेरिका ने उसके नाभिकीय शस्त्रों को सुरक्षित करने के लिए 10 करोड़ डॉलर खर्च किए। खबरें ऐसी भी हैं कि अमेरिका ने पाकिस्तान को मिसाइल लांच कोड प्रणाली भी दी है, ताकि नाभिकीय मिसाइलों का अनधिकृत प्रयोग न हो सके।

इसके अलावा पाकिस्तान को पीएएल प्रौद्योगिकी दिए जाने की भी खबर है। हालांकि पाकिस्तान का कहना है कि उसने अमेरिका से न तो किसी भी तरह तकनीकी सहायता मांगी थी, न ही उसे मिली है। पाकिस्तान के पास कितने नाभिकीय हथियार हैं और वे कहां रखे गए हैं, यह तथ्य बेहद गोपनीय है। पाकिस्तान ने अमेरिका की तरफ से इस बारे में ज्यादा सूचनाएं इकट्ठा किए जने का कड़ा विरोध किया है।

उन्हें डर है कि अगर पाकिस्तान के नाभिकीय हथियारों पर किसी तरह का खतरा दिखता है तो अमेरिका उन्हें हटाने या नष्ट करने में संकोच नहीं दिखाएगा। अमेरिका ने ऐसा सुझव भी दिया है कि अगर पाकिस्तान के परमाणु हथियार उग्रवादियों के हाथों में पड़ते हैं तो उससे निपटने के लिए उसके पास आकस्मिक योजना है। पर वह योजना क्या है, यह अब तक किसी को मालूम नहीं है। इस बीच भारत को इस बात का अनुमान होना चाहिए कि अगर पाकिस्तान में राज्य का ढांचा ध्वस्त होता है तो उसके क्या परिणाम होंगें, क्योंकि उसके बाद वहां काबिज होने वाली शक्तियों से वह उस तार्किकता की उम्मीद नहीं कर सकता जो सरकार से करता रहा है।  

harsh. pant@ kcl. ac. uk

लेखक किंग्स कालेज लंदन में प्राध्यापक हैं।

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