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उत्तराखंड : नए मुख्यमंत्री की चुनौतियां

उत्तराखंड में दो साल के बाद ही भाजपा के नए मुख्यमंत्री की ताजपोशी हो गई है। नये मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के पास राजनीति का लम्बा अनुभव है। सरस्वती शिशु मंदिर के शिक्षक से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफर उन्होंने बेहद कुशलता से तय किया है। पर ईमानदार तथा सख्त प्रशासक के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले मुख्यमंत्री की राह अंतिम समय तक भी न छोड़ने वाले फौजी मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूड़ी की विरासत संभालना नये मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

खंडूड़ी के सख्त मिजाज से भले ही कुछ विधायक तथा नौकरशाह नाखुश रहे हों पर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे राज्य को पटरी पर लाने के लिए उन्होंने कई बुनियादी काम किए। उन्होंने सरकारी भर्ती में पारदर्शिता अपनाने के लिए अभ्यर्थी को प्रतियोगी परीक्षा में अपनी उत्तर-पुस्तिका की कार्बन कॉपी अपने साथ घर लाने की इजजत दे दी, ताकि वह परिणाम निकलने पर अपने नम्बरों का मिलान कर सकें। ज्यादातर नौकरियों के लिए साक्षात्कार की बाध्यता समाप्त कर दी गई। इससे भर्ती घोटाले के धंधे से जुड़े धंधेबाज बेरोजगार हो गए।

खंडूड़ी का दूसरा डंडा उत्तराखंड में सक्रिय भू-माफियाओं पर चला, जिन्होंने करोड़ों की बेनामी कृषि भूमि किसानों से औने-पौने दामों पर खरीदकर जमीनों के दाम रातों-रात आसमान पर पहुंचा दिये थे। इससे किसान तथा असली खरीददार दोनों पिसने लगे। इस दौरान भू-माफियाओं ने सौ गुना तक मुनाफा वसूली की और इस लाभ के धंधे में कई नेताओं तथा नौकरशाहों ने जमकर पैसा बटोरा।

खंडूड़ी ने कुर्सी संभालते ही कृषि की जमीन की अनावश्यक खरीद पर रोक लगा दी और शहरी क्षेत्र में आवास के लिए खरीदी जाने वाली जमीन की सीमा 500 मीटर से घटाकर 250 मीटर कर दी। यानी कोई भी अपने आवास के लिए बस इतनी ही जमीन उत्तराखंड में कहीं भी खरीद सकता है।

इससे उत्तराखंड तथा बाहर के भू-माफियाओं की करोड़ों की बेनामी जमीन फंस गई, जिसमें उन्होंने इस उम्मीद में पैसे लगा रखे थे कि बाद में इसे भारी कीमत पर बेच सकेंगे। लेकिन इस फैसले से जमीनों के दाम गिरे और आम उपभोक्ता की जद में आ गए। यह भी बताया जाता है कि खंडूड़ी के इस कदम से भू-माफिया के हजरों करोड़ रुपये फंस गए। इन भू-माफियाओं और बिल्डरों में सभी राजनीतिक दलों से सम्बंध रखने वाले लोग हैं।

खंडूड़ी ने इस बात को स्वीकर किया कि जमीनों की खरीद-फरोख्त से प्रतिबंध हटाने के लिए उन पर कई तरह के दवाब आये, पर राज्य के गरीब किसानों को बेघर करने वाले कदम की भला एक मुख्यमंत्री कैसे इजजत दे सकता है! इस कदम से किसानों की करोड़ों की जमीनें कौड़ियों के दाम बिकने से बच गई और जरूरतमंदों को भी अपनी छत के लिये उचित कीमतों पर जमीन मिल रही है। नये मुख्यमंत्री निशंक के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन दोनों ही फैसलों को बरकरार रखने की होगी, क्योंकि मुख्यमंत्री बदलते ही दबाव बनाने की राजनीति नए सिरे से शुरू हो सकती है।

लोकसभा चुनाव में भाजपा की भले ही करारी हार हुई हो पर मुख्यमंत्री खंडूड़ी के कुछ कार्यो के राज्य में जबरदस्त प्रशंसक है। वे एक डेमोकट्र के तौर पर भले ही अपनी छवि बना पाने में असफल रहे हों पर अपनी ईमानदार छवि बरकरार रखने में सफल रहे। वैसे खंडूड़ी की अपनी भी कुछ कमियां रही हैं, जिनको नये मुख्यमंत्री निशंक आसानी से पाट सकते है।

खंडूड़ी ने गरीबों की मदद के लिए बनाये गये मुख्यमंत्री राहत कोष के लिए बड़े अजीबो-गरीब नियम बनाये। जैसे अगर किसी गरीब को अपनी बीमारी के इलाज के लिए मदद चाहिए तो उसे जिलाधिकारी की संस्तुति पर देने का नियम था। इससे जनप्रतिनिधि को भी अपने किसी कार्यकर्ता के इलाज के लिए जिलाधिकारी के घर और दफ्तर के चक्कर काटने पड़ते थे। नौकरशाही में फंसी यह राहत कई जगह मरीज के द्वार तब पहुंची, जब बीमार का स्वर्गवास हो चुका था और कई मामलों में कैंसर व हृदय रोग जैसी गम्भीर बीमारी के लिए मात्र पांच-सात हजार रुपये की मदद मिली।

खंडूड़ी पर यह आरोप भी अक्सर लगता रहा था कि उनसे मुलाकात के लिए आम आदमी तो छोड़िए विधायक तक तरस जाते हैं। निशंक में सबको साथ लेकर चलने की क़ूवत तो है पर उत्तराखंड में भाजपा का मुख्यमंत्री के मामले में ट्रैक रिकॉर्ड ठीक नहीं रहा है। राज्य में जहां कांग्रेस के पांच साल के कार्यकाल में सिर्फ एक मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी रहे, वहीं भाजपा ने अपने चार साल के कार्यकाल में अपना चौथा मुख्यमंत्री पेश कर दिया है।
 
लेखक हिन्दुस्तान दिल्ली में विशेष संवाददाता हैं।

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