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सद्गुणों की महत्ता

एक इंसान सच्चे मायने में इंसान तभी होता है, जब उसके अंदर इंसानियत हो। इंसानियत तब पैदा होती है, जब इंसान अच्छे गुणों को धारण करता जाए। बेहतर इंसान बनकर हम अपना तो भला करते ही हैं, परिवार एवं समाज का भी भला होता है। एक बेहतर समाज बनाने में जितना अच्छे गुणों एवं मूल्यों का महत्व है, उतना और किसी का भी नहीं। जिस तरह से एक महकने यानी खुशबू बिखेरने वाला फूल आस-पास के माहौल को खुशनुमा कर देता है और सब का चहेता बन जता है, उसी तरह एक सद्गुणी इंसान अपने सद्गुण रूपी खुशबू से सबका चहेता बनकर वाहवाही पाता है।

जिन्दगी महज धन-दौलत, मान-सम्मान हासिल करने के लिए नहीं होती। ये सारी चीजें जिन्दगी को खुशनुमा बनाने के लिए हैं। एक बेहतर जिन्दगी में सबसे बेहतर चीज कोई है, तो वह है- सद्गुण एवं मूल्यों का समावेश। घटिया से घटिया इंसान अच्छा बनना चाहता है। मजबूरीवश वह भले ही घटिया काम करता रहे, लेकिन वह भी अच्छे इंसान के रूप में जीना चाहता है। ऋग्वेद में कहा गया है- कृण्वन्तो विश्वमार्यम् यानी दुनिया को बेहतर बनाने के लिए कोशिश करते रहो।

जाहिर है हम दुनिया को बेहतर तभी बना सकते हैं, जब हम खुद बेहतर इंसान बनें। और एक बेहतर इंसान वही है जिसमें दया, करुणा, प्रेम, अहिंसा, न्याय, सदाशयता, भाईचारा, सत्य, शुभ, परोपकार एवं संयम जैसे सद्गुणों के प्रति लगाव हो। जब हमारे दिल में सद्गुण बढ़ते जाते हैं तो हम उससे भी प्यार करने लगते हैं, जो मुझसे नफरत करता है।

सारी दुनिया एक परिवार लगने लगती है। सब का दुख अपना दुख लगने लगता है। हममें बेहतर बनने की क़ूवत आ जाती है। दीनता, क्षीणता, दुख, दुगरुण और अशुभ हमारे लिए शुभ बन जाते हैं। सभी परिस्थितियां अपने अनुकूल बन जाती हैं। प्रतिकूलताएं निराशा और हीनता नहीं पैदा करतीं। अपने अंदर ऐसा आत्म-विश्वास जागता है कि हम खुद को बदल, समाज में भी एक सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

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