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विवाद की धारा

इस साल देश के तमाम शहरों में समलैंगिकों के अधिकारों के समर्थकों ने कुछ ऐसे उत्साह से प्रदर्शनों का आयोजन किया, जैसे कि भारतीय दंड विधान की धारा 377 खत्म ही होने वाली है। हालांकि कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने इस मामले में कुछ भी कहने में लगातार सावधानी बरती है, लेकिन समलैंगिकों और उनके समर्थकों का उत्साह भी व्यर्थ नहीं है। यह भी उनके लिए एक बड़ी विजय है कि सरकार इस अब तक तलघर में दबे मुद्दे पर गौर करने को तैयार है।

उनके लिए यह भी सुखद है कि इस साल समलैंगिकों के प्रदर्शन ज्यादा धूमधाम और न्यूनतम आशंका के साथ हो सके। कानूनी अधिकार से ज्यादा जरूरी समाज में स्वीकार है और नैतिक स्तर पर सबसे ज्यादा संवेदनशील और शुद्धतावादी मध्यम वर्ग में समलैंगिकता के प्रति सहिष्णुता और स्वीकार इधर निश्चय ही बढ़ रहा है। धारा 377 के खिलाफ भी आमतौर पर समाज के उदार और प्रबुद्ध तबकों में आम सहमति है, लेकिन उसे हटाना इतना सरल नहीं होगा।

समलैंगिता के खिलाफ कानून के समर्थन में कई लोग हो सकते हैं। कई धार्मिक संस्थाएं इसे हटाने के खिलाफ होंगी, समाज और सरकार में कई प्रभावशाली लोग भी अपने नैतिक आग्रहों के चलते इसे हटवाना नहीं चाहेंगे और कई लोग जो सिद्धांतत: धारा 377 के खिलाफ हैं, वे भी इसे हटाने का समर्थन करने में हिचकिचाएंगे क्योंकि बात यौन शोषण जैसी बुराइयों के खिलाफ यह कानून एक निरोधक हथियार है।

भारत में सीमा पार तक से यौन शोषण के लिए अवयस्क लड़के-लड़कियों की तस्करी एक गंभीर समस्या है और समलैंगिता और वेश्यावृत्ति के खिलाफ कानून इसके खिलाफ कुछ कानूनी रुकावटें पैदा कर सकते हैं। गरीबी और कानून-व्यवस्था तंत्र की अकर्मण्यता से वसे ही भारत यौन पर्यटन का एक केन्द्र बन रहा है और धारा 377 जैसे कानून इसके ग्राहकों तथा दलालों के लिए कुछ तो खौफ पैदा करते हैं।

आदर्श स्थिति तो यह है कि अवयस्क यौन शोषण के खिलाफ सख्त कानून हों और उनका चुस्ती से पालन किया जाए, लेकिन व्यावहारिक स्थिति में कई अड़चनें दिखती हैं। समाज इस मामले में ज्यादा उदार हो रहा है, इसलिए हमें उम्मीद करनी चाहिए कि समलैंगिकों की समस्याएं कम होंगी। कानून मंत्री का सावधानी भरा रवैया भी इस मामले में ठीक ही है कि इससे प्रतिक्रियास्वरूप उग्र प्रतिरोध का खतरा कम होगा। समाज में परिवर्तन धीरे-धीरे आता है और यह सिर्फ भारत नहीं, सारी दुनिया के लिए सही है।

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