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लाल गलियारे की सियासत

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का 11 अप्रेल 1964 को विभाजन हुआ। एक नई पार्टी बनी। इसका नाम था, सीपीआई-माक्र्सवादी। नई पार्टी की जरूरत इसलिए महसूस की गई, क्योंकि असंतुष्ट सदस्यों की निगाह में सीपीआई का नेहरू सरकार के प्रति दृष्टिकोण हमदर्दी का था। संसदीय पद्धति के बहाव में बह रही थी। सोवियत यूनियन की पिछलग्गू थी और साम्राज्यवादी ताकतों के साथ ज रही थी। सीपीएम का विश्वास था कि संसदीय पद्धति की जरूरत सिर्फ टैक्टिकल है। काम चलाने भर के लिए। उससे आधारभूत क्रांति नहीं हो पाएगी।

उस वक्त तक शायद सीपीएम के नेतृत्व को यकीन नहीं था कि तीन बरस बाद ही उसे सरकार में शामिल होना होगा। 1967 के बाद से बंगाल में सीपीएम विचित्र दुविधा में है। दो मार्च 1967 को बंगाल में पहली संयुक्त मोर्चा सरकार बनी। लगभग उसी वक्त सीपीएम के अपने असंतुष्टों ने उत्तरी बंगाल के नक्लबाड़ी इलाके में किसानों का आंदोलन छेड़ दिया। उस आंदोलन के गर्भ से 1969 में एक और पार्टी निकली, जिसका नाम था सीपीआई-एमएल। सीपीएम के ज्यादातर आदर्शवादी-लड़ाकू नौजवान उस पार्टी में चले गए। सीपीएम ने उसे एडवेंचरिम करार दिया। बचकाना वामपंथ।

वह बचकाना वामपंथ आज उसके गले की हड्डी बना हुआ है। भारतीय राष्ट्र राज्य ने अपने गावों, खासकर आदिवासी इलाकों को तवज्जो नहीं दी। औद्योगिक मजदूरों की क्रांति की जड़ें यहा जमी नहीं। ग्रामीण क्रांति के लिए बेहतर हालात हमेशा रहे। आजादी के बाद तेलंगाना आंदोलन पहला ऐसा प्रयास था। आंदोलनों का दमन करने वाली मशीनरी अंग्रेजों के पहले से हमारे यहा मौजूद है। कहते हैं कि देश के 160 से ज्यादा जिले माओवादियों के शिकंजे में हैं। पर ऐसा नहीं है। करीब साढ़े छह लाख गांवों में से कुछ सौ गांव ही ऐसे होंगे, जहां सिर्फ माओवादी राज चलता है। इससे जुड़े लोगों के साथ हमारी हमदर्दी होनी चाहिए। वे हाशिए में पड़े लोग हैं। माओवादी विचार जनता को आगे रखकर पीछे से हिंसा की रणनीति के सहारे चल रहा है।

मंथली रिव्यू की नेटसाइट पर एमआरजइन नाम से विमर्श का एक कोना है। इसमें हाल में जेएनयू के छात्रों की एक टीम ने लालगढ़ से एक रपट भेजी है। वस्तुत: उसमें माओवादियों का पक्ष रखा गया है। इसमें इस बात पर जोर है कि माओवादी इस इलाके के विकास का काम कर रहे हैं। इन लोगों ने 20 किमी लम्बी सड़क सिर्फ 47 हजार रु में बना दी। पंचायत बनाती तो 15 हजर रु प्रति किमी की दर से बनाती।

कहने का मतलब संवधानिक संस्थाएं भ्रष्टाचार से घिरी हैं। उनकी तुलना में माओवादी ईमानदार हैं। ऐसा ही सत्ता में आने के पूर्व सीपीएम के कार्यकर्ता मानते थे। कांग्रेस सरकार के बारे में ऐसा ही भाजपा कार्यकर्ता कहते थे। माओवादियों ने चेकडैम बनाए, स्वास्थ्य केन्द्र शुरू किए और जमीन भी बाटी है। उन्होंने नरेगा की तर्ज पर रोजगार योजना भी चलाई। वे राज्य की निष्क्रियता को रेखांकित करना चाहते हैं।

हाल में अखबारों में रिपोर्ट थीं कि माओवादी अपने इलाकों में सम्पन्न लोगों से वसूली कर रहे हैं। ऐसा ज्यादातर आतंकी संगठनों के साथ होता है। पैसे की वसूली टैक्स की तरह है, जो दे सकता है उसीसे वसूला जता है। माओवादी संगठन इतने अनुशासित नहीं कि सारा पैसा केन्द्रीय कोष में आए। वे आरोप लगाते हैं कि बंगाल में सीपीएम समर्थक सरकारी इमदाद खा जते हैं। ऐसा माओवादियों के साथ नहीं होगा क्या? वे भी अपने समर्थकों के मित्र हैं।

क्या सीपीएम समर्थक गरीब नहीं हैं? दरअसल सीपीएम और माओवादियों में फर्क इतना है कि एक सत्ता में है, दूसरा नहीं। वह सत्ता में आया तो ऐसा ही व्यवहार नहीं करेगा, इसकी गारंटी है क्या? उसे संसदीय राजनीति पसंद नहीं, इसलिए उसने समांतर राजनीति की रचना की। पर यह पूरी तरह समांतर राजनीति नहीं है। इसने इस बार बंगाल के चुनाव को प्रभावित किया और सीपीएम विधान सभा चुनाव में इसके संभावित असर के अंदेशे में फूक-फूक कर कदम रख रही है।

माओवाद का वचारिक तत्व अपनी जगह है। उसका उद्देश्य राज्य की निरंकुश सत्ता को रेखांकित करना और प्रतिरोध करना है। यहा तक वह ठीक है। पर वह समांतर राज्य खड़ा कर रहा है। उसके पास वकल्पिक मॉडल नहीं है। नेपाल में माओवादी आए, पर वे विफल रहे। उनकी भूमिका राजतंत्र के खात्मे के साथ खत्म हो गई। संसदीय राजनीति के वे खिलाड़ी नहीं हैं। और वकल्पिक राजनीति की ताकत और समझ उनके पास नहीं है। यह राजनीति ज्यादातर देशों में विफल रही है।

इसके मुकाबले संसदीय राजनीति के पास गरीबी और पिछड़ेपन का हल क्या है? हम अपने इसबार के चुनाव परिणामों से संतुष्ट हैं, सिर्फ इसलिए कि केन्द्र में एक स्थिर सरकार बन पाई है। यह सरकार आर्थिक विकास और पूजी निवेश में कामयाब हो, रोजगार पैदा करे, निचले स्तर पर व्यक्ति के जीवन में खुशहाली लाए, शिक्षा-स्वास्थ्य वगैरह में अपनी भूमिका निभाए तो बेहतर परिणाम मिलेंगे। भ्रष्टाचार हमारी व्यवस्था में गहरा बैठा है।

वह सोवियत व्यवस्था में भी था, चीन में भी है और नेपाल के माओवादी राज में भी था। जनता की बेहतर भागीदारी के साथ वह कम हो सकता है। यह भागीदारी माओवादी व्यवस्था में होगी, ऐसा मान लेने की कोई वजह नहीं है। यह विचार जनता को ढाल की तरह इस्तेमाल करता है। ऐसा न होता तो वे अपने ही वर्ग के लोगों की हत्या न करते। वे युवा वर्ग के रूमानी सपनों का दोहन करते हैं। पर वे छिपकर काम करते हैं।

भारत में कम्युनिस्ट विचार हमेशा लुका-छिपी का खेल खेलता रहा। उन्हें संसदीय व्यवस्था पर यकीन नहीं, पर वे इसमें हैं। वे जनता की नाराजगी को मुखर करने और आंदोलन खड़े करने में ही कामयाब रहे हैं। व्यवस्था कायम करने में वे सफल नहीं हुए हैं। उन्हें सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों है। खुली व्यवस्था कितनी ही खराब हो, उसमें एक बड़े मध्यवर्ग की भागीदारी है।

इस वर्ग की खासियत है कि वह अपनी आलोचना को भी सुन सकता है और अपने से नीचे के वर्ग के हित के लिए लड़ सकता है। प्रकाश करात मानते हैं कि माओवादी संगठनों पर पाबंदी लगाना ठीक नहीं। उनसे राजनैतिक स्तर पर डील करना चाहिए। यह बात लश्करे तैयबा पर लागू होती है और हिन्दूवादी कट्टर संगठनों पर भी। इन सबसे राजनैतिक स्तर पर ही निपटना चाहिए। इसके लिए मुख्यधारा के मजबूत और समझदार राजनैतिक दल चाहिए। अभी ऐसे दल नहीं हैं। ज्यादातर पार्टिया मौकापरस्त हैं। लालगढ़ में भी यही हो रहा है। गौर से देखें।

pjoshi @hindustantimes. com

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

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