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उर्दू मीडिया : सरकोजी के बयान पर नाराजगी

बुर्को को गुलामी और पिछड़ेपन की निशानी बताने पर राष्ट्रपति सरकोजी के वक्तव्य पर मुसलमानों में तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। लगभग सभी उर्दू अखबारों ने इस पर सम्पादकीय लिख कर अपने रोष को व्यक्त किया है। ‘राष्ट्रपति फ्रांस की मुस्लिम दुश्मनी’ के शीर्षक से दैनिक ‘मुनसिफ’ ने लिखा है कि एक तरफ तो कुछ मुस्लिम देशों के शासक धर्मो के बीच सौहार्द पैदा करने, ईसाइयत और इस्लाम को करीब लाने की कांफ्रेंस करते रहते हैं तो दूसरी तरफ यूरोपीय देशों में मुसलमानों को पीड़ित करने का सिलसिला लगातार जारी है।

कभी पैगम्बर पर हमले किए जाते हैं, कार्टून बनाए जाते हैं, आतंकवाद के विरुद्ध मुहिम का निशाना भी मुसलमान ही हैं, इराक और अफगानिस्तान तबाह किए जा चुके हैं, पाकिस्तान को तबाह करने की तैयारी है, ईरान में संकट पैदा किया जा रहा है। कभी ईसाई दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक एवं आध्यात्मिक गुरु पोप मस्जिद में जूते पहनकर दाखिल हो जाते हैं, विभिन्न देशों में मुस्लिम महिलाओं पर बुर्को पर पाबंदी लगायी जा रही है। इसी सिलसिले का ताजा उदाहरण फ्रांस का है जहां सरकोजी ने यह ऐलान किया कि फ्रांस में बुर्को के लिए कोई जगह नहीं है। सच तो यह है कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने यह वक्तव्य देकर मुस्लिम महिलाओं की पहचान, आजदी और अकीदे (विश्वास) पर हमला करके दुनियाभर के मुसलमानों को मानसिक रूप से पीड़ित किया है। यह पहला मौका है, जब मुसलमानों को मानसिक पीड़ा पहुंचाने का काम किसी देश के राष्ट्रपति ने खुद किया है।

अखबार आगे लिखता है कि यूरोप के सभी गिरजघरों और कलीसाओं में धार्मिक और सामाजिक कार्य करने वाली महिलाएं जिन्हें ‘नन’ कहा जता है, अधिक संख्या में मौजूद हैं। इनका लिबास किसी प्रकार की गुलामी अथवा पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं है तो मुस्लिम औरत का लिबास गुलामी और पिछड़ेपन का प्रतीक कैसे होगा?

मोनिसा बुशरा आबिदी ने अपने लेख ‘मेरा हिजब मेरा चुनाव’ के शीर्षक से लिखा है कि हम इस बहस में नहीं पड़ना चाहते कि इस्लाम महिलाओं को चेहरा खोलने की आजदी किन शर्तो के साथ देता है, परन्तु यह अवश्य कहेंगे कि यदि कोई महिला किसी भी स्थिति में चेहरा (मुंह) छिपाना चाहती है तो उसे नहीं रोका जना चाहिए। निस्संदेह फ्रांस के राष्ट्रपति यह तय नहीं कर सकते कि उनको किस प्रकार का बुर्का पहनना चाहिए।

कार्ला ब्रूनी के साथ आजाद जीवन मुबारक हो वह चाहे जितना उसे समाज में निर्वस्त्र करते फिरें और उनके साथ पूर्व के दैहिक यौन संबंध का फ्रांस ही नहीं, बल्कि विश्वभर के समाचार-पत्रों में प्रचार करते फिरें कि पशुतापूर्ण और जंगली सभ्यता इससे अधिक कुछ और सिखा भी नहीं सकती। दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ के अपने लेख में आगे लिखा है कि पर्दे पर आपत्ति व्यक्त करने से पूर्व सौ बार सोच लेते तो अच्छा था। पश्चिमी देशों ने यह भी महसूस कर लिया है कि पर्दे पर आपत्ति ने इस्लामी सभ्यता के फलने-फूलने के अधिक अवसर प्रदान किए हैं और जितनी आपत्ति में बढ़ोतरी होगी, उतनी ही इस्लामी सभ्यता की लोकप्रियता बढ़ेगी।

महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) का के. पी. रघुवंशी को चीफ बनाए जने पर दैनिक ‘उर्दू टाइम्स’ ने मुसलमानों के जख्मों पर नमक छिड़कना बताया है। पहले पेज पर प्रकाशित खबर में आल इंडिया उलेमा काउंसिल के महासचिव मौलाना महमूद दरियाबादी ने सरकार से मांग की कि वह रघुवंशी के चयन पर पुनर्विचार करे क्योंकि रघुवंशी ने मालेगांव बम धमाकों के आरोप में जिस तरह बेगुनाह मुसलमानों को गिरफ्तार किया है, उससे आज भी वे सभी युवक जेलों में बंद हैं। यदि सरकार ने अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया तो आने वाले विधानसभा चुनाव में मुसलमान कांग्रेस का साथ नहीं देंगे।

मौलाना आजद एजुकेशनल फाउंडेशन के इंस्पेक्टिंग ऑफिसर एवं बिहार प्रांत मजदूर संघ के राष्ट्रीय सचिव महमूदुल हसन हकीमी ने रघुवंशी को एटीएस चीफ बनाये जने पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि पूरे देश विशेषकर महाराष्ट्र में मुसलमानों ने व्यापक स्तर पर इसके खिलाफ विरोध किया, लेकिन सरकार के कानों पर जू तक नहीं रेंगी। यह मुसलमानों से उनकी वफादारी के बदले में कांग्रेस ने उन्हें दिया है।

गैर बिरादरी में शादी न होने का फतवा गत दिनों जमिया अमजदिया, मऊ के मुफ्ती आले मुसतुफा मिस्बाही ने जो दिया था, उस पर वाद-विवाद तेज हो गया है। जमिया मिलिया इस्लामिया में इस्लामिक स्टडीज के प्रोफेसर अखतारुल वासे, फतवा ऑनलाइन के चेयरमैन मुफ्ती अरशद फारुकी और वरिष्ठ स्तंभकार अब्दुल हमीद नोमानी ने फतवे से अपनी असहमति प्रकट करते हुए इसका कड़ा विरोध किया है। मुफ्ती मिस्बाही उर्दू पत्रिका ‘जमे नूर’ में अपने सिलसिलेवार लेख में निरंतर लिख रहे हैं कि बिरादरी से बाहर के लड़के से परिजनों की अनुमति के बिना विवाह नहीं हो सकता।
                                                           
लेखक स्तंभकार हैं

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