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न्यायिक सुधार के सवाल

व्यापक आर्थिक सुधारों के इस युग में न्यायिक सुधार एक बड़ी जरूरत रही है। यह काम बहुत पहले शुरू हो जाना चाहिए था। फिर भी यह संतोष की बात है कि विधिमंत्री वीरप्पा मोइली ने देर से ही सही पर उसका एक दुरुस्त खाका तैयार किया है, अब देखना यह है कि उसे लागू करने में आने वाली व्यावहारिक बाधाएं कितनी जल्दी पार हो जाती हैं। सितंबर के मध्य तक स्पष्ट होने वाले इस खाके का जो भी स्वरूप उभर रहा है, उसकी मांग लंबे समय से होती रही है। जैसे कि मुकदमों के लंबित रहने की अवधि अगर 15 साल से तीन साल तक कर दी जाती है तो  इससे न सिर्फ वादकारियों को फायदा होगा, बल्कि न्यायपालिका का बोझ भी हल्का होगा।

यह सही है कि बहुत तेजी से होने वाले न्याय में अन्याय होने का खतरा रहता है, लेकिन न्याय की गाड़ी मुकदमों से ओवरलोड रहे तो उससे न्याय के वातावरण के प्रदूषित होने और गाड़ी के बैठ जाने का जोखिम होता है। जब इस देश में सबसे बड़ी वादकारी सरकार है तो भ्रष्टाचार वगैरह के मुकदमे जल्दी निपटाने के लिए सीबीआई की सौ अदालतें और कायम किए जना लाजिमी है। लेकिन उसी के साथ यह भी आवश्यक है कि न्यायमूर्ति की निष्पक्षता बनी रहे। इसी सिलसिले में जजों की संपत्ति घोषित किए जाने के लिए कानून बनाने का प्रस्ताव भी न्यायिक जवाबदेही और  पारदर्शिता के लिहाज से स्वागत योग्य है।

जजों की जवाबदेही और न्यायपालिका की छवि पर विधि मंत्रालय की गंभीरता का अनुमान इस बात से भी लगाया ज सकता है कि मोइली ने आजदी के बाद किसी जज पर महाभियोग साबित न हो पाने पर चिंता जताई है और कलकत्ता हाई कोर्ट के एक जज पर जल्दी ही महाभियोग चलाए जने का आश्वासन भी दिया है।

न्यायिक आयोग के माध्यम से सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं तलाशने के सुझाव में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा शुरू हो पाने की वह उम्मीद भी पूरी होती लग रही है, जिसकी चर्चा लंबे समय से चली आ रही थी । लेकिन व्यापक सुधार के यह कार्यक्रम लागू करने की प्रक्रिया निर्बाध नहीं होने वाली है। शिक्षा में सुधार का विरोध शुरू हो गया है और हो सकता है न्यायिक सुधारों का उससे भी ज्यादा विरोध हो। इसलिए इसे लागू करने के लिए सरकार को विधायिका ही नहीं बेंच और बार दोनों को भी विश्वास में लेना होगा।

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