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माओवादी पर 1908 के कानून के तहत प्रतिबंध लगाएं : केंद्र

माओवादी पर 1908 के कानून के तहत प्रतिबंध लगाएं : केंद्र

केंद्र ने पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार से भाकपा (माओवादी) को वर्ष 1908 के कानून के तहत गैरकानूनी संगठन घोषित करने को कहा है क्योंकि इस कानून का दायरा गत वर्ष प्रभाव में आए गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून से कहीं ज्यादा है। हालांकि इस मुद्दे पर केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार तथा माकपा व अन्य सहयोगियों के बीच गहरे मतभेद हो जाने के कारण माओवादी समस्या से निपटना आसान नहीं लग रहा है। आशंका है कि माओवादी देश के किसी न किसी भाग में सक्रिय रहेंगे।


केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार को भाकपा (माओवादी) को प्रतिबंधित संगठन घोषित करने की सलाह इस तथ्य के कारण दी गयी है कि जिस गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून के तहत गत 22 जून को इस संगठन को प्रतिबंधित किया था। वह पृथकतावादियों का समर्थन करनेवाले गैरकानून संगठनों के खिलाफ लाजिमी तौर पर निर्देशित है। एक अधिकारी ने कहा, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 1908 (सीएलएए) का उद्देश्य बिल्कुल अलग है। यह उन संगठनों के खिलाफ हैं जो हिंसा या भयभीत करने के कृत्य को अंजाम देने वाले व्यक्तियों की मदद करते हैं या उन्हें बढ़ावा देते हैं। संगठन को गैरकानूनी घोषित करने का अधिकार राज्य सरकार को मिला हुआ है। पश्चिम बंगाल को इस बारे में अब भी फैसला करना है। कुछ असमंजस के बाद मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा है कि राज्य सरकार केंद्र के प्रतिबंध को लागू करेगी। गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून के तहत गैरकानूनी संगठन के मायने ऐसे किसी संगठन से हैं जिसका मकसद अवध गतिविधियों से जुड़ा हो।


उधर, जानकारों का मानना है कि लालगढ़ में जो लड़ाई देखने को मिल रही है, वैसे संघर्ष कमोवेश अन्य राज्यों में भी हो रहे हैं। केन्द्र तथा राज्य एवं माकपा सहित वामदलों के परस्पर विरोधाभासी नजरिये के कारण मामला पेचीदा नजर आता है और आशंका है कि माओवादी किसी न किसी रूप में गतिविधियां जारी रखेंगे ।

माकपा सहित वामपंथी दल माओवादियों को आतंकी करार दिये जाने पर ऐतराज व्यक्त करते हुए कह रहे हैं कि भाकपा (माओवादी) को केवल आतंकी संगठन करार देकर प्रतिबंधित करने से समस्या हल नहीं होगी। वामपंथी दलों के कुछ नेताओं ने भाषा को बताया कि माओवादी सामाजिक-राजनीतिक कमजोरियों का फायदा उठाकर राजनीतिक हिंसा की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन उन्हें सिर्फ आतंकी संगठन करार देने से समस्या का कोई समाधान नहीं निकलेगा।
 केन्द्र सरकार माओवादियों को किसी भी स्थिति में कोई ढील देने के मूड में नजर नहीं आती। उसने उनसे वार्ता की पूर्व शर्त के रूप में हथियार डालने को कहा है। ऐसा की कुछ बंगाल सरकार का भी कहना है लेकिन माओवादी इसे मानने को तैयार नहीं हैं। जानकारों की मानें तो माओवादियों ने केन्द्रीय और राज्य सुरक्षाबल की कार्रवाई के बाद अपनी भूमिगत गतिविधियां और तेज कर दी हैं और व्यापक पैमाने पर वे सरकारी मशीनरी से टकराने की तैयारी कर रहे हैं। वे हथियार डालने के मूड में जरा भी नहीं दिखते।


वामदलों के सूत्रों ने कहा कि माओवादियों के साथ मिल बैठकर आदिवासी इलाकों की मूल समस्याओं को दूर करने के प्रयास के जरिए ही  इस बीमारी का इलाज  निकल सकता है। किसी तरह की एकतरफा सख्ती से बात बनने की बजाय बिगड़ने के आसार ज्यादा हैं।

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