class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

क्रिकेटरों के लिये हाट जाब बन गया है कमेंटेटर

क्रिकेटरों के लिये हाट जाब बन गया है कमेंटेटर

क्रिकेटर से कमेंटेटर बने जैसा वाक्य कभी रिची बेनो के लिये उपयोग किया जाता था लेकिन उनके बाद ज्योफ्री बायकाट, सुनील गावस्कर, रवि शास्त्री, इयान चैपल, टोनी ग्रेग आदि के दिलकश अंदाज और चैनलों से मिलने वाली मोटी रकम ने इसे इतना हाट जाब बना दिया कि अब भाषा पर पकड़ रखने वाला हर क्रिकेटर इसी पेशे में कूदना चाहता है और पेशेवर कमेंटेटर गिनती के रह गये हैं।

 

अनिल कुंबले और सौरव गांगुली इस पेशे में नये रंगरूट हैं इन दोनों ने इंग्लैंड में ट्वंटी 20 विश्व कप से अपनी यह नयी पारी शुरू की और अब उसमें अपना रंग जमाने के लिये तैयार है। कुंबले ने तो कमेंट्री बाक्स में भी जलवा दिखाया जबकि गांगुली टूर्नामेंट के सेमीफाइनल सेअवतरित हुए और वह अधिकतर विशेषज्ञ की भूमिका में ही दिखे।


 क्या कमेंटेटर का चोला पहनने वाले कमेंटेटर अपनी नयी भूमिका से न्याय कर पाते हैं। अपने जमाने के मशहूर कमेंटेटर और कई अंतरराष्ट्रीय मैचों के गवाह बने जसदेव सिंह का इस सवाल पर सीधा जवाब होता है नहीं । उन्होंने कहा कि कमेंट्री एक कला है। इसमें शब्दों को पिरोया जता है जैसे कि कविता। खिलाड़ी कितना भी बढ़िया हो वह शब्दों की माला नहीं पिरो सकता । आजकल का चलन है कि कमेंटेटर बने खिलाड़ी या तो अपने अनुभव का बखान शुरू कर देता है या फिर खिलाड़ी या अंपायर पर अंगुली उठाते हैं।


क्रिकेटरों के कमेंट्री में कूदने का ही कारण है कि अब पेशेवर कमेंटेटर गिने चुने रह गये हैं और क्रिकेट की अच्छी समक्ष रखने वाला आवाज का धनी कोई भी व्यक्ति इसे पेशे के रूप में नहीं अपना रहा है। वर्तमान समय में अंग्रेजी कमेंट्री में बायकाट, गावस्कर, शास्त्री, अकरम के बीच हर्षा भोगले और टोनी कोजियर जसे ही गिने चुने पेशेवर कमेंटेटर दिखते हैं, जबकि हिन्दी में जसदेव सिंह, सुशील दोषी, नरोत्तम पुरी आदि की टक्कर का कोई कमेंटेटर नहीं दिखता है।

कई क्रिकेटर हिन्दी की कमेंट्री में भी हाथ आजमा रहे हैं लेकिन भाषा पर अच्छी पकड़ नहीं होने के कारण वह प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं। जसदेव सिंह का मानना है कि केवल क्रिकेट का ज्ञान, उसे खेलने या भाषा बोलने भर से ही कोई कमेंटेटर नहीं बन जाता। उन्होंने कहा कि आप जिस भी भाषा में कमेंट्री कर रहे हों, आपको उसके व्याकरण और शब्दों की बहुत अच्छी जनकारी होनी चाहिए जो कि एक दो क्रिकेटरों में देखने को मिलती है। आज की हिन्दी कमेंट्री तो अंग्रेजी की बैसाखियों पर चल रही है।

यदि क्रिकेटरों के कमेंटेटर बनने की बात की जए तो बेनो असल में पहले ऐसे क्रिकेटर थे जिन्होंने कमेंट्री को पूर्णकालिक पेशा बनाया। वह 1960 के दशक से कमेंटेटर की भूमिका निभा रहे हैं और इसलिए उन्हें कमेंट्री का ब्रैडमैन भी कहा जता है। उनके नाम एक अनोखा विश्व रिकार्ड है जो दुनिया में हर किसी के लिये चुनौती बना रहेगा। वह 500 से अधिक टेस्ट मैचों में खिलाड़ी या कमेंटेटर के तौर पर मौजूद रहे। बायकाट, फारूख इंजीनियर, गावस्कर, बिशप, माइकल होल्डिंग, अकरम, इयान चैपल, टोनी ग्रेग, नासिर हुसैन, संजय मांजरेकर, रमीज राज, रवि शास्त्री, लक्ष्मण शिवरामाकष्णन, बाब विलिस जसे 100 से अधिक क्रिकेटरों को क्रिकेट से अलविदा कहने के बाद यही सबसे बढ़िया पेशा लगा। यहां तक कि पोमी म्बांग्वा, मार्क रिचर्डसन, निक नाइट, अरुण लाल, ज्योफ लासन, रणजीत फर्नांडो, डेमियन फ्लेमिंग, माइक गैटिंग, ग्राहम गूच, एलन डोनाल्ड, साइमन डाउल, अतहर अली खान, स्काट स्टायरिस, मार्क टेलर, केपलर वेसल्स आदि को भी यह जाब सबसे हाट लगता है। कभी काउंटी क्रिकेट में ग्लोमोर्गन और ग्लूस्टरशर की तरफ से खेलने वाले एलन विलकिन्स इंग्लैंड की टीम में जगह बनाने से तो चूक ये थे लेकिन पहले बीबीसी और अब ईएसपीएन स्टार स्पोटर्स के वह चर्चित कमेंटेटर है। उन्हीं की तरह प्रथम श्रेणी मैचों से आगे बढ़ने में असफल रहने वाले कई अन्य क्रिकेटरों ने भी कमेंटेटर बनकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से जुड़ने की हसरत पूरी की।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:क्रिकेटरों के लिये हाट जाब बन गया है कमेंटेटर