class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अजमेर सालाना उर्स हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल

अजमेर सालाना उर्स हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल

सूफी संत ‘गरीब नवाज’ ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का सालाना उर्स हिन्दू-मुस्लिम एकता की जीती जागती मिसाल पेश करता है। दरगाह पर सजदा करने के लिए देश-विदेश से आए हर जाति व मजहब के लोगों का हुजूम भाईचारे के अनूठे मंजर से रूबरू कराता है, जो शायद ही कहीं दिखाई देता है।

ख्वाजा के 797 वें उर्स की अनौपचारिक शुरुआत 19 जून को बुलंद दरवाजे पर उर्स का झंडा चढ़ाने के साथ ही हो गई थी लेकिन रजब का चांद दिखाई देने पर इसकी औपचारिक शुरुआत मानी जाती है, जो निर्धारित तिथि से एक दिन देर से 25 जून को दिखाई दिया था।

उर्स का झंडा चढ़ाने के साथ ही दरगाह में जियारत के लिए आने वाले जायरीनों का तांता लगना शुरू हो गया था और यह सिलसिला अभी जारी है। पाकिस्तान से 304 जायरीनों का एक जत्था 27 जून से यहां आया हुआ है। बताया जाता है कि 26 जून को दरगाह पर पौने दो लाख जायरीनों ने जुमे की नमाज अता की थी।

उर्स के मौके पर कई बड़े नेताओं की तरफ से भी ख्वाजा के दरबार में मन्नत की चादरें चढ़ाई गईं, जिनमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई सहित कई केन्द्रीय मंत्री और अन्य नेता शामिल हैं। इन नेताओं ने अपने लिए मन्नत मांगने के साथ ही देश में अमन-चैन और भाईचारे की मन्नत भी मांगी है।

उर्स के अलावा अन्य सामान्य दिनों में भी कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष, नेता, अभिनेता और अभिनेत्रियां तथा देश-विदेश के जाने माने खिलाड़ी ख्वाजा की मजार पर सजदा करने और मन्नत मांगने के लिए आते रहते हैं।

हजरत मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ईरान में सीस्तान के संजर या सजज गांव में सैय्यद गयासुद्दीन और सैयदा बीवी उम्मु वरा माहे नूर के घर में 18 अप्रैल 1143, 537 हिजरी में हुआ था। वह शुरू से ही गरीबों के प्रति रहमदिल और दरियादिल थे जिससे उन्हें ‘गरीब नवाज’ कहा जाने लगा। उनका परिवार बाद में इसहाक शामी हेरात के पास चिश्त कस्बे में रहने लगा जिससे उनके नाम के पीछे चिश्ती लग गया और आगे चलकर यह सूफियों का एक सम्प्रदाय बन गया।

ख्वाजा ने अपने गुरु उस्माने हारूनी पीर की बीस साल तक सेवा की। उनके गुरु का यही उपदेश था ‘गरीबों के साथ प्यार से पेश आना, उनकी सेवा करना, बुराइयों से बचना और मुसीबत तथा कष्ट के दिनों में अपने संकल्प को मजबूत रखना।’

हजरत मोइनुद्दीन पैंबद लगे लिबास में फकीरी के वेश में अपने अंतिम सफर के लिए 1195 में अजमेर आए और लोगों में प्यार और भाईचारे का संदेश फैलाया।

एक रात ख्वाजा हमेशा की तरह अपने कमरे में इबादत के लिए गए तो पांच दिन तक बाहर नहीं आए। छठे दिन अकीदतमंदों ने दरवाजा खोला तो पाया कि ख्वाजा दुनिया छोड़ चुके हैं। वह 11 मार्च 1233 रजब 633 हिजरी का दिन था। उसी कमरे में उन्हें सुपुर्दे खाक किया गया। बाद में एक से छह रजब तक ख्वाजा का उर्स मनाने की परम्परा चल पड़ी।

यह वही मजार है, जहां उनका इंतकाल हुआ। राजा-महाराजाओं ने इसे दरगाह का रूप दिया और गरीब नवाज की यह दरगाह दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गई।

उर्स के लिए देश-विदेश से आने वाले जायरीनों के लिए विशेष सुरक्षा प्रबंध तथा अन्य इंतजाम किए गए हैं। खुफिया विभाग की भी उर्स के दौरान पैनी नजर रहती है। उसके लगभग 100 कर्मचारियों को मेला क्षेत्र में चप्पे-चप्पे पर तैनात किया गया है, जो रात-दिन चौकसी में लगे हैं।

उर्स में जुमे की दूसरी नमाज तीन जुलाई को होगी और इसी के साथ अजमेर शरीफ का यह सालाना उर्स समाप्त हो जाएगा।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:अजमेर सालाना उर्स हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल