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प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का असर

प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का असर व्यापक रूप से दिखाई देने लगा है। मानसून आने में देरी, भूगर्भ जल स्तर में कमी के बाद अब पेड़-पौधों ने भी असमय ही सूखना शुरू कर दिया है। शीशम के पेड़ों के बाद औषधीय पौधे नीम के पेड़ के सूखने से कृषि रक्षा अधिकारी भी हैरान है। वह भी पर्यावरणीय बदलाव को इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं।


वातावरण में आ रहे बदलाव के कारण इमारती लकड़ी का महत्वपूर्ण स्रोत शीशम के पेड़ कई वर्षो से अचानक सूखने लगे हैं। उम्रदराज पेड़ों के अलाव नई उम्र के पेड़ भी जल्दी ही धरती का साथ छोड़कर सूख गए। वन अधिकारियों ने इसे पर्यावरणीय प्रदूषण से जोड़कर देखा था। अब आयुर्वेदिक औषधि के रूप में इस्तेमाल होने वाला नीम का पेड़ भी सूखने लगा हैं। अक्सर फरवरी-मार्च में नीम के पत्ते पीले पड़कर झड़ जाते हैं। इसके बाद अप्रैल में नए पत्तों का आगमन होता है। लेकिन मौसम की मार के चलते जून माह में ही नीम के पत्ते पीले पड़कर झड़ने लगे हैं। कई वृक्ष सारे पत्ते झड़ने के बाद अब सूखने लगे हैं। यह हालत सभी जगह दिखाई दे रही है। जिला कृषि रक्षा अधिकारी डॉ. सतीश मलिक भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि ग्लोबल वार्मिग के कारण पेड़-पौधों का जीवनचक्र भी बुरी तरह गड़बड़ा गया है। इस हालत के लिए जिम्मेदार कारकों की जांच की जाएगी। फिलहाल पेड़ सूखने का कारण पर्यावरणीय बदलाव ही माना जा रहा है।

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