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बाजारीकरण रुके तो बदले शिक्षा का चेहरा

केंद्र सरकार ने जब शिक्षा व्यवस्था में भारी बदलाव के लिए कमर कसी है तो प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में बने आयोग की सिफारिशें उसका आधार बन गई हैं। दुनिया भर के कई बड़े संस्थानों में काम कर चुके इस मशहूर भौतिकशास्त्री का शिक्षा क्षेत्र के सुधारों से पुराना नाता रहा है। वे लंबे समय तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उच्च शिक्षा को लेकर जब वे एक बार फिर चर्चा में आए तो उनसे रू-ब-रू हुए मदन जैड़ा-

आपकी कमेटी के जो सुझव हैं, क्या उनसे शिक्षा प्रणाली बेहतर बन सकेगा?
निश्चित रूप से। कपिल सिब्बल ने प्राइमरी एजुकेशन से लेकर हायर एजुकेशन तक का चेहरा बदलने के लिए जिन कदमों की घोषणा की है, वह समय की जरूरत है। ऐसा पहले हो जाना चाहिए था। अब जरूरत इन घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने की है।

शिक्षा पर बाजारवाद हावी हो चुका है। इसकी रोकथाम कैसे संभव है ?
दरअसल, शिक्षा में निजी क्षेत्र का दखल बढ़ा है, लेकिन हमारी नियामक एजेंसी अपनी भूमिका ठीक-ठीक नहीं निभा पा रही हैं। चाहे वह यूजीसी हो, एआईसीटीई या फिर एमसीआई। इसलिए आज इन एजेंसियों की प्रासंगिकता खत्म हो गई है। हमने इनकी मॉनिटरिंग के साथ-साथ इनकी गुणवत्ता को भी बढ़ाने के लिए एक स्वायत्त आयोग बनाने की सिफारिश की है। प्रस्तावित नियामक सिर्फ कॉलेज खोलने की अनुमति देने के लिए नहीं होगा, बल्कि उनकी गुणवत्ता, उनमें अनुसंधान आदि की गतिविधियों को भी सुनिश्चित करेगा। जबकि मौजूदा एजेंसियां सिर्फ लाइसेंसिंग एजेंसियां बनकर रह गई हैं।

विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुमति मिलती है तो उससे होड़ और नहीं बढ़ेगी?
इसीलिए विदेशी विश्वविद्यालयों को लेकर कड़ा कानून बनाए जाने की जरूरत है। हम विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में आने के विरोधी नहीं हैं। हमें खुशी होगी कि कल हार्वर्ड विश्वविद्यालय यहां अपना कैंपस खोल दे। लेकिन ऐसा न हो कि विदेशी विश्वविद्यालय को अनुमति मिलते ही छोटे-मोटे मुनाफे कमाने वाले तो देश में आ जाएं और नामी विश्वविद्यालय नहीं। इसलिए एक समग्र कानून की जरूरत है।

निजी क्षेत्र से ये उम्मीद कैसे कि जा सकती है कि वह मुनाफे का ख्याल छोड़कर शिक्षा में निवेश करे?
देखिए, देश में निजी क्षेत्र में स्कूल-कॉलेज कोई नई बात नहीं है। यह सालों से होता रहा है। सेंट स्टीफन और हंसराज कॉलेज जैसी संस्थाएं अर्से से कार्य कर रही हैं। हम यह  नहीं कह रहे कि वे घाटे में काम करें। लेकिन सिर्फ मुनाफे  के लिए कोई कंपनी या कोई संस्था स्कूल/कॉलेज खोले तो इससे खेदजनक स्थिति और क्या हो सकती है? इन संस्थानों से एक ‘डिग्रीधारी प्रोडक्ट’ भले ही तैयार हो जाए, लेकिन एक बढ़िया पेशेवर नहीं निकल सकता। इसलिए निजी क्षेत्र की भागीदारी तय करते समय इस यक्ष प्रश्न का हल ढूंढ़ना चाहिए। शिक्षामंत्री नगरपालिका के स्कूलों में भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

क्या यह बेहतर नहीं है कि स्कूलों की गुणवत्ता खुद सरकार सुधारे ?
सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पूरी तरह से खराब है, यह कहना  गलत होगा। हमारे केंद्रीय विद्यालय, जवाहर नवोदय विद्यालय वर्ल्ड क्लास के हैं। मिडिल और हाईस्कूल भी ज्यादा खराब नहीं है। हां, प्राइमरी एजुकेशन कमजोर है, उसे सुधारने के उपाय होने चाहिए। दक्षिणी राज्यों में स्थिति सुधर भी रही है। इस दिशा में कार्य करने का अभी भी स्कोप है।

दसवीं का बोर्ड खत्म करने के मामले में कई राज्य इसका विरोध कर रहे हैं?
कुछ साल पहले हमने जब राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का फ्रेमवर्क तैयार किया था, तब यह सिफारिश भी की थी। सिब्बल ने पुन: इस मुद्दे को उठाया है। मेरा मानना है कि दसवीं की बोर्ड परीक्षा बेमतलब है। सिर्फ एक बोर्ड परीक्षा होनी चाहिए जहां से छात्र विश्वविद्यालय में प्रवेश करता है। यानी 12 की बोर्ड परीक्षा ठीक है, इसलिए दसवीं बोर्ड को खत्म कर देना ही उचित होगा।

क्या एक बोर्ड सिस्टम लागू करके राज्य बोर्ड खत्म कर देने चाहिए?
यह भी बुरा नहीं है, इस पर राज्यों से बात की जानी चाहिए। वे तैयार होते हैं तो देश भर में एक बोर्ड सिस्टम लागू हो सकता है।

उच्च शिक्षा में अभी भी 14 फीसदी बच्चे ही आते हैं, इसे कैसे बढ़ाया जाय?
केंद्र ने मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का विधेयक लाने की बात कही है। यह कानून बन जाता है तो 12वीं पास करने वालों का प्रतिशत बढ़ेगा और उच्च शिक्षा में प्रवेश भी बढ़ जाएगा। अभी तो सिर्फ 10 फीसदी किशोर 12वीं पास करते हैं।

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर मैकिंजी ने सवाल उठाए हैं, क्या स्थिति वाकई इतनी खराब है?
पहले समझना होगा कि मैकिंजी का पैमाना क्या था? मेरे विचार से स्थिति इतनी खराब नहीं है। यदि हम शिक्षा को जॉब से जोड़कर देखते हैं तो आज कोई भी काम ऐसा नहीं है, जिसे एक शिक्षित युवक 20 दिन में समझकर करने न लगे। इसलिए ऐसे दावे बेमानी हैं।

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