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मंच बेमंच का प्रपंच

पिछले दिनों तीन मंचीय कवि एक एक्सीडेंट में गुजर गए। इनमें एक ओमप्रकाश आदित्य थे, जिन्हें इस लेखक ने टीवी पर कई बार सुना था। जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस्तीफा दे दिया था तो कुछ दिन शायद उन्हें अपने इस कदम पर अफसोस हुआ और पता चला कि वे अपना इस्तीफा वापस लेना चाहते हैं तब आदित्य का एक छंद बड़ा हिट हुआ था ‘मेरा इस्तीफा लौटा दो वरना इस्तीफा दे दूंगा।’

अब एक और हास्य कवि अल्हड़ बीकानेरी भी गुजर गए हैं। उम्र और रोग के लपेटे में निकल गए। मंच की एक पुरानी पीढ़ी की चलाचली की बेला है। कुछ बे मौत चले जाते हैं कुछ को मौत ले जाती है। इसका कुछ नहीं किया जा सकता। मंच के कवि एक रात के लिए कविता करते हैं अमरता के लिए नहीं। यह तत्व वे जानते हैं, इसलिए हल्के हास्य में मस्त रमा करते हैं। काका हाथरसी मरे तो कह गए कि मेरी शवयात्रा में हास्य कवि सम्मेलन करते चलना। रोना नहीं।

हिंदी में मंचीय और रंगमंचीय श्रद्धा अपने-अपने खित्ते में, अपने-अपने इलाकों में, अपने मुहल्लों और ठीयों में प्रस्तुत हुआ करती है। हिंदी में ‘कवि’ अलग होते हैं और ‘मंचीय कवि’ अलग होते हैं। उनके मंच अलग हैं उनकी अभिव्यक्तियां अलग हैं और उनका रेट तक अलग-अगल होता है। मरते भी अलग-अलग शैली में हैं।

‘कवि’के पास ‘कविता’ होती है, मंचीय कवि के बारे में कहा जाता है कि ये सब मसखरे होते हैं और फूहड़ अश्लील किस्म के चुटकुलों को नाच गाकर पेश करते हैं और इस तरह जनता की रुचि को फूहड़ बनाने का काम करते हैं। गंभीर कवि जनता का इंतजार करते रहते हैं कि वह मंच को छोड़ इनके पास अपने आप आएगी।

मंचीय कवि उनसे बहस नहीं करते जो सिर्फ कवि कहलाया करते हैं और गंभीर किस्म की कविता करते जाने जाते हैं। जिनकी चर्चा अक्सर विद्वान लोग कर लिया करते हैं। इनके ‘कविकर्म’ की चर्चाएं होती रहती हैं। बीस-तीस लोग कविताएं सुना करते हैं और पूरी कविता कवि पढ़ जाता है तो लगता है कि किसी शोक सभा का प्रस्ताव पढ़ रहा है। न कोई ताली पड़ती है न कोई हंसी छूटती है, कोई वाह-वाह तक नहीं करता। इस वातावरण को विचारशील वातावरण कहा जाता है, जिसमें कविता ‘गंभीर रस’ में रहती है।

इस कविता के पास कवि होता है और अकेला कवि होता है उसके संग के कवि तक उसके नहीं होते। उसे नहीं नते-पढ़ते। कवि के पास जनता के नाम पर एक बड़ा शून्य होता है इस कविता का कोई पब्लिक स्फीयर नहीं होता। मंचीय कवि के पास कविता जितनी होती है, उससे ज्यादा उस कविता की जनता होती है। पब्लिक स्फीयर होता है। कवि लोग कभी जनता को कविता नहीं सुनाते, पुराने कवि सुनाया करते थे। निराला, बच्चन, दिनकर सुनाया करते थे। उसके बाद जब से नई कविता आई, तबसे मंच से उतर कर कविता सिर्फ पांच-सात पचास की गोष्ठियों में कैद हो गई।

कविता जितनी कठिन होती, उतनी ही आश्चर्यचकित करती। लोग भविष्य में समझेंगे मुझे! ऐसा कहती जान पड़ती। कठिनाई एक मूल्य बन गई, अमूर्तता एक मूल्य बन गई। हिंदी कविता में इतने ‘कठिन काव्य के प्रेत’ हो गए कि केशव तक अपना शुक्लकृत अपमान भूल गए। इन दिनों हर कवि अपनी कविता में नाराज परेशान सा रहा करता है। यह अलग बात है कि परेशानी का सबब नहीं मिलता। मंचीय कवि के पास जनता होती है। दिन भर की थकी-हारी, नगर-कस्बे में शाम की तफरीह के लिए निकले छोहरे, रिटायरमेंट को याद करते बुजुर्ग जो देर रात तक मंचीय कविता सुनकर वाह-वाह करते हैं। अगर न जमे तो हूट करते हैं। हिसाब तत्काल होता है, जनता को कविता कंट्रोल नहीं करती तो गायब हो जाता है कवि!

इस जनता की ताली के लिए कवि उसी तरह के टोटके इस्तेमाल करते हैं जिस तरह नच बलिए या कॉमेडी शो वाले करते हैं। ये कवि प्रस्तुति पर जोर दिया करते हैं और कविता की या गीत की पंच लाइन पर नाटकीय बलाघात करते हैं, जो उन्हें उस रात, उस मंच का हीरो बना दे। एलीट कवियों के लिफाफों में अधिकतम हजार दो हजार होते हैं। वह भी अक्सर किसी अकादमी के चेक रूप में।

मंचीय कवि का लिफाफा भारी होता है। कैश वाला होता है। इन दिनों के हिट कवियों के लिफाफे बीस-तीस हजार से लेकर पचास हजार तक के होते हैं। एक रात के एक कवि सम्मेन के एक कवि को बीस हजार से पचास हजार मिलें तो यही कहा जाएगा कि हिंदी में कविता के लिए पर्याप्त सपोर्ट बेस है। लेकिन क्या गजब है कि ‘समंच’ कवि ‘बेमंच कवियों’ से डरा करते हैं जब कि ‘कवि जन’ मंच की हंसी उड़ाते हैं। दोनों हिंदी के दो रंग हैं। अपने को दोनों प्रिय हैं। काश वे एक दूसरे के भी कभी प्रिय बनें!

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