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जमीन का सच और स्टूडियो के लोग

राजनीति में कुछ मसले इतने जटिल हो गए हैं कि पुराने ढंग की पत्रकारिता से उन्हें समझना मुश्किल है। पहले यह माना जाता था कि पत्रकार का काम किसी मसले के दोनों पक्षों को पेश करना और फैसला पाठकों के विवेक पर छोड़ देना है, लेकिन आज के दौर की रिपोर्टिग का इतना ध्रुवीकरण हो गया है कि सिर्फ एक अखबार को पढ़कर या एक चैनल को देखकर आपको पूरी जानकारी नहीं मिल सकती।

लालगढ़ के मामले में यह दिखाई दे रहा है कि कुछ टिप्पणीकारों के नजर में यह सिर्फ आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था का मामला है। मेल टुडे में मनोज जोशी का कहना है कि जब तक हम माओवादियों को समाजवाद के नजरिये से देखेंगे और कानून व्यवस्था के नजरिये से नहीं, हम उनका मुकाबला नहीं कर पाएंगे। और टेलीविजन पर अजय साहनी जसे सुरक्षा विशेषज्ञ का कहना है कि लालगढ़ का मसला नियंत्रण और दबाव का मसला है और जब तक सरकार नक्सलवादियों को 1970 की तरह दुबारा कुचल नहीं देती, तब तक इन जिलों में सरकार नहीं चल पाएगी।

दूसरी तरफ वे पत्रकार और टीकाकार हैं, जिन्हें सबसे पहले लालगढ़ के आदिवासियों की बुरी हालत दिखाई देती है। इनकी बातों को पढ़कर पता लगता है कि पश्चिम बंगाल में माकपा सरकार किस कदर नाकाम रही है। यह भी पता लगता है कि मुख्यमंत्री पर कातिलाना हमले के बाद आदिवासियों पर किस तरह का जुल्म हुआ है। और लालगढ़ में पुलिस अत्याचार के खिलाफ जो जनसमिति बनी है, वह किस हद तक माओवादियों का ही एक मोर्चा है और किस हद तक एक वास्तविक पुलिस अत्याचार विरोधी अभियान है? यह तय करना सचमुच मुश्किल है, क्योंकि मीडिया के पास इस मसले पर अलग-अलग तरह की खबरें और विचार हैं। लालगढ़ जकर पत्रकार जो देख रहे हैं, वह बात सुरक्षा विशेषज्ञों को नहीं दिखाई देती।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों की एक समिति जब वहां गई तो उसे पुलिस और माकपा कॉडर के अत्याचार ही दिखाई दिए। उस पर उनकी रिपोर्ट मौजूद है। और जब हिंदू अखबार के प्रवीण स्वामी वहां गए तो उन्हें सिर्फ माओवादियों की क्रूरता ही दिखाई दी। दोनों ही बातें एकपक्षीय हैं। ऐसे हालत में मीडिया की क्या भूमिका हो सकती है? क्या वह ऐसे सबूत पेश करे, जो सरकार की रणनीति के पक्ष में जते हों? या वह सरकार के माओवादी अभियान की कमजोरियां दिखाए?

लालगढ़ के इतने पहलू हैं कि मीडिया का काम आसान नहीं है। अक्सर लिखने वाले की अपनी विचारधारा भी आड़े आ जती है। एनडीटीवी इंडिया के सिवा कोई भी हिंदी चैनल सरकार से जुड़े गंभीर मसलों में दिलचस्पी नहीं लेता। और अंग्रेजी चैनल में जब चर्चा होती है तो गरीबों की बात करने वाले ज्यादातर लोग राजनीतिक नेता ही होते हैं। एक विपक्ष का, एक सत्ताधारी दल का। हर कोई अपनी पहले से कही हुई बातों को दोहरात भर है।

जब सीएनबीसी टीवी-18 पर अजय साहनी यह बता रहे थे कि कड़े पुलिस प्रशासन और कानून व्यवस्था से ही बात बनेगी तो तृणमूल के सौगत राय यह बता रहे थे कि माकपा के तीस साल के शासन के बाद भी आदिवासियों को जो भी मिल जाता है वह उसी को खाकर गुजर-बसर करने को मजबूर हैं। उनकी बात में दम था, लेकिन करण थापर इस पर ज्यादा समय खर्च करने को तैयार नहीं थे।

हमारे टेलीविजन एंकर और संपादक लोग जिलों में कम जाते हैं, इसलिए जब वे स्टूडियो में बैठकर ग्रामीण स्थिति पर बात करते हैं तो बात सतही होकर रह जाती है। सुरक्षा मुद्दे पर चर्चा करना ज्यादा आसान है। इसी तरह कपिल सिब्बल के शिक्षा सुधार प्रस्तावों पर जो चर्चा हो रही है, वह बहुत सीमित नजरिये से चल रही है।

कक्षा दस के बच्चों पर दबाव ऐसा मसला है, जिसे हमारे मीडिया वाले समझते हैं। उन सबके बच्चे स्पर्धा के इस दौर में ये दबाव झेल रहे हैं। लेकिन कक्षा दस के लिए बोर्ड के इम्तिहान की शुरुआत क्यों हुई थी और व्यवसायिक पाठ्यक्रम के लिए गांवों और कस्बों में क्या व्यवस्था है, इसे देखने वाले पत्रकार और टीकाकार बहुत कम हैं।

किसी भी मामले के हर पहलू को सामने लाने के लिए भारत जैसे देश में खबरों के संग्रह पर खर्च करना काफी जरूरी है। यह जरूरी है कि रिपोर्टरों को प्रदेशों में भेज जाए। वे असलियत को समझ सकें, इसका वक्त देना भी जरूरी है। तहलका जैसी पत्रिका ऐसी कोशिश करती रहती है। लेकिन उससे कहीं ज्यादा कमाने वाले टेलीविजन चैनल और अखबार खबर खोजने पर खर्च के लिए तैयारी नहीं हैं।

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