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शिक्षा से मुनाफे के सवाल

प्रोफेसर यशपाल समिति की रिपोर्ट से शिक्षा नीति एक बार फिर चर्चा में आ गई है। समिति ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को समाप्त करने से लेकर निचले स्तर की शिक्षा तक में बदलाव के बहुत सारे सुझाव दिए हैं। समिति यह भी चाहती है कि देश में निजी विश्वविद्यालयों को परिसर खोलने की छूट दी जाए और निजी क्षेत्र की भूमिका के लिए प्रावधान तय किए जाएं। शिक्षा क्षेत्र के लिए ऐसे सुझव नए नहीं है, इन पर खासी चर्चा होती रही है। इसलिए समिति ने जितने समाधान पेश किए हैं उससे ज्यादा सवाल खड़े हो गए हैं।

शिक्षा को लेकर लोगों के मन में एक डर यह है कि शिक्षा हासिल करना लगातार जिस तरह से महंगा होता जा रहा है, उससे कुछ समय बाद कहीं ऐसा न हो कि यह ग़रीबों की पहुँच के बिल्कुल बाहर हो जाए। मंहगी तो निजी क्षेत्र की प्राइमरी स्तर तक की शिक्षा भी हो रही है। लेकिन सबसे ज्यादा चिंता उच्च शिक्षा के लिए बने निजी संस्थानों को लेकर है, जिन्हें लगातार मान्य विश्वविद्यालय का दर्जा धड़ल्ले से दिया जा रहा है। इन विश्वविद्यालयों से भारी कैपिटेशन फीस और गुप्त रूप से धन लिए जाने की खबरें भी आती रही हैं। इधर उच्चतम न्यायालय ने भी एसबीएन सागर कॉलेज मामले में एक कठोर टिप्पणी की है कि निजी शिक्षण संस्थान शिक्षा व्यवस्था को गहरा आघात पहुंचा रहे हैं।

यह सच है कि शिक्षा के क्षेत्र में निजी निवेश लगतार बढ़ रहा है और यह बता पाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है कि कौन सचमुच शिक्षा के लिए निवेश कर रहा है और कौन महज पैसा कमाने के लिए। वैसे तो एक कल्याणकारी राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और न्याय लोगों को या तो मुफ्त मिलनी चाहिए या कम-से-कम पैसे पर। रोटी, कपड़ा और मकान के बाद ये सबसे अहम् जरूरतें हैं और विकास का पैमाना भी यही होना चाहिए कि नागरिकों को मौलिक आवश्यकताओं के अलावा ये तीन चीजें किस हद तक सुलभ हैं। विडंबना यह है कि आज शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय ये तीनों ही सेवाएं आम आदमी की पहुँच के बाहर हो गयी हैं।

यह भी सच है कि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के साथ ही सरकारी नियंत्रण में बढ़ोत्तरी हुई है और इससे अकर्मण्यता और अक्षमता भी आई है। भ्रष्टाचार भी बढ़ा है। जिस तरह से मान्य विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी है, उसके कारण में भी इसी भ्रष्टाचार को ही देखा जा रहा है। 1958 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पहली शैक्षणिक संस्था थी, जिसे मान्य विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया, लेकिन अभी करीब 150 मान्य विश्वविद्यालय हैं। इनमें से कुछ के शक्षणिक स्तर और शिक्षा के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी के सवाल भी उठाए जते रहे हैं।

शिक्षा सबको सुलभ हो, यह मांग दशकों से की जाती रही है और इसके लिए प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और इसे एक मौलिक अधिकार बनाने की मांग भी होती रही है। सबसे पहले 1993 में ज़े पी़  उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश मामले में उच्चतम न्यायालय ने कैपिटेशन फी के दंश को ख़त्म करने के लिए व्यावसायिक शिक्षा का एक तरह से राष्ट्रीयकरण कर दिया था। अदालत ने 14 वर्ष की उम्र तक शिक्षा को संविधान के अनुच्छेद-21 में दिये गये जीवन के अधिकार के अन्तर्गत एक मौलिक अधिकार माना। बाद में संसद ने अनुच्छेद-21 में संशोधन कर शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया।

उन्नीकृष्णन के फैसले के अधिकांश हिस्से को उच्चतम न्यायालय की 11 जजों की एक संविधान पीठ ने टीएमएपई फाउंडेशन के मामले में 2002 में पलट दिया और शिक्षा को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर बाज़ार की शक्तियों के समक्ष खड़ा कर दिया। इसमें व्यवस्था दी गयी कि शैक्षणिक संस्थान स्थापित करना संविधान के अनुच्छेद-19;1 के तहत यदि व्यापार नहीं तो व्यवसाय है, तथा 26ए के तहत एक परमार्थ सेवा। अदालत ने कहा कि निजी शैक्षणिक संस्थान आवश्यक हैं, क्योंकि सरकार ऐसे संस्थान खोल नहीं रही है। इसमें यह भी व्यवस्था दी गयी कि ऐसे निजी संस्थानों को अपनी फीस तय करने का अधिकार होगा जो सरकारी मदद नहीं ले रहे हैं।

हालांकि इसमें स्पष्ट कहा गया कि ये लाभ के लिए नहीं होगा और कैपिटेशन फीस नहीं ली जा सकती है, क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य परमार्थ है। लेकिन इस फैसले से शिक्षा के व्यापारीकरण का रास्ता खुल गया। इस फैसले में यह कहा गया था कि जो व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं वे उसके लिए भुगतान करें, जिससे निजी संस्थानों ने मनमाने ढंग से छात्रों से पैसे ऐंठने शुरू कर दिये। टीएमएपई फैसले की सही व्याख्या के लिए उच्चतम न्यायालय की एक 5-सदस्यीय संविधान पीठ की स्थापना इस्लामिक अकादमी मामले में की गयी। उस निर्णय की व्याख्या के नाम पर 5 जजों की पीठ ने 11 जजों की पीठ के फैसले को पलटते हुए उन नियंत्रणों को दोबारा थोप दिया, जिसे टीएमएपई मामले में हटा दिया था। यानी एक छोटी पीठ ने बड़ी पीठ के निर्णय को पलट दिया, जो परंपरा के अनुकूल नहीं हेै। इस पर भी संशय पूरी तरह दूर नहीं हुआ और पीए इनामदार मामले में संशयों को दूर करने के लिए एक सात-सदस्यीय पीठ की स्थापना की गयी। इसने इस्लामिक अकादमी के मामले में इस व्यवस्था को ख़त्म कर दिया कि निजी व्यावसायिक संस्थानों में भी सरकार आरक्षण कर सकती है। परंतु इस फैसले में टीएमएपई मामले की इस व्यवस्था को माना कि शिक्षा व्यवसाय हो सकती है, हालांकि संविधान के अनुच्छेद-19;6 के तहत सरकार कुछ उचित कटौती उसमें कर सकती है। परंतु एक मुद्दे पर मतैक्य बना रहा कि शिक्षण संस्थान लाभ कमाने के लिए नहीं हैं।

हालांकि सबको शिक्षा देने के काम में गैर सरकारी क्षेत्र हाथ बटाए, यह धारणा भी कोई बहुत नई नहीं है। तमाम तरह की सामाजिक संस्थाओं और दानदाताओं के द्वारा खोले गए स्कूल कॉलेज आज भी पूरे देश में हैं। डीएवी कॉलेज जसा शिक्षा का आंदोलन पूरे देश में फैला और वह भी बिना किसी सरकारी मदद के। ईसाई मिशनरी स्कूल भी यही करते रहे हैं। इन सबने शिक्षा के प्रसार में खास योगदान दिया है और बिना कोई मुनाफा कमाए। लेकिन अब निजी क्षेत्र के नाम पर जो संस्थाएं सामने रही हैं, उनमें ज्यादातर का मकसद महज मुनाफा कमाना ही है। ऐसे में सरकार से ऐसे इंतजाम की उम्मीद तो करनी ही चाहिए कि कोई भी प्रतिभा सिर्फ इसीलिए उच्च शिक्षा से वंचित न रह जाए कि उसके पास फीस भरने के पैसे नहीं हैं।

लेखक टेलीविजन पत्रकार स्तंभकार हैं

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