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बुरा मानो या भला : बीवियां, बेटियां या..

कई साल पहले लंदन में एक नजारा देखा था। मैं उसे भूल नहीं पाता। एक सरदार जी अपनी बीवी के साथ टहल रहे थे। सरदार जी पैंट कोट और टाई में थे। उनकी बीवी सलवार, कमीज और दुपट्टे में थीं। वह आगे-आगे चल रहे थे, बीवी पीछे-पीछे। वे एक-दूसरे से बात कर रहे थे। वह आगे चलते हुए ही बोलते रहते थे। बीवी पीछे से ही उन्हें जवाब देती थीं। शायद वे लोग नए-नए किसी पंजाबी गांव से वहां आए थे। गांव की जिंदगी की ही तरह वह चाहते थे कि उनकी बीवी पीछे-पीछे चले। सरदार जी ने अंगरेजों के अंदाज में पहनना-ओढ़ना तो सीख लिया था। लेकिन उनकी तरह बीवी के साथ-साथ घूमना नहीं सीखा था। यह नजारा बार-बार मेरे जेहन में आता रहा, जब मैंने संसद में महिला बिल पर बहस होते देखी।

इस मसले पर मेरी अलग राय है। मेरी जिंदगी में आदमी-औरत को लेकर कोई भेदभाव नहीं है। अगर कोई है भी, तो वह औरत की ही तरफ होगा। मैंने महिला बॉस के साथ काम किया है। आकाशवाणी की विदेश सेवा में मेहरा मसानी मेरी दो साल बॉस थीं। उन्हें डायरेक्टर जनरल होना चाहिए था। लेकिन किसी आदमी को वह दे दिया गया। मेरे खयाल से वह बेहद गलत फैसला था। प्रधानमंत्री के तौर पर पंडित जवाहर लाल नेहरू ने महिलाओं को बराबरी का दजा्र देने की खासी कोशिशें की थीं। हिंदू कानून के जरिए उन्होंने पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सा देने की कोशिश की थी। पंडित जी ने बहु विवाह को जुर्म बना दिया था। तलाक और गुजारा भत्ता का अधिकार भी दिया था। महिलाओं को वोट देने का अधिकार भी उसमें शामिल था। अपनी पढ़ी-लिखी महिलाओं ने उस अधिकार का ठीक से इस्तेमाल किया। बिना पढ़ी-लिखी महिलाएं उसके इस्तेमाल से बचती रहीं। दरअसल, आरक्षण का विचार ही समाज के एक उपेक्षित तबके को आगे बढ़ाने पर टिका हुआ है। वह भी उनकी कीमत पर जो मेरिट पर हैं। मेरा मानना है कि महिलाओं या जाति के आधार पर आरक्षण देश और प्रगति की कीमत पर ही होगा।

आप मेरी बात को याद रखिए। अगर महिलाओं को आरक्षण देने का कानून बनता है, तो ये सारी सीटें नेताओं की बीवियों, बहनों, बेटियों और बहुओं के नाम ही चली जाएंगी। जाति वगैरह के नाम पर जो महिलाएं आएंगी, उन्हें लोकतंत्र के बारे में कुछ भी मालूम नहीं होगा। अगर महिलाएं गांव पंचायत में चुनी जाती हैं, तो मुझे समझ में आता है। उन्हें अपने गांव और गांववालों की जानकारी होती है। लेकिन विधानसभा और लोकसभा में मैं उनकी हिस्सेदारी पर सवाल ही उठा सकता हूं।

टेनिस फैंटेसी

हाल ही में टीवी पर मैंने फ्रेंच ओपन देखा। अब विंबलडन देख रहा हूं। मैं अपनी एक पसंदीदा कहानी सुनाता हूं। एक टेनिस के फैन थे। वह 70 साल की उम्र तक हर शाम चार-पांच सेट खेल लेते थे। एक दिन उन्हें दिल में कुछ तकलीफ हुई। वह डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने उनसे कहा कि खेलना बंद कर दें। नहीं तो परेशानी हो जाएगी। उन्होंने कहा, ‘ये नहीं हो सकता। इससे अच्छा क्या होगा कि मैं जीत का स्मैश मारने के बाद मर जाऊं।’

वही हुआ। वह टेनिस कोर्ट पर ही चल बसे। लेकिन जीतने के लिए स्मैश मारने के बाद नहीं, बल्कि डबल फॉल्ट करने के बाद। मैं भी 80-85 साल तक टेनिस खेलता रहा। एक प्रदर्शनी मैच में लिएंडर का पार्टनर था। दूसरी ओर आनंद बाजार पत्रिका के मालिक अवीक सरकार और रमेश कृष्णन थे। लिएंडर ने मुझे अंकल कहा। कृष्णन जितनी धीमी सर्व कर सकते थे उतनी की। लेकिन सेट खेलने के बाद मेरा बुरा हाल था। मैं आते ही बिस्तर पर पड़ गया था।

खैर, मेरी टेनिस देखने की चाहत बनी रही। मैं उसे देखता रहता हूं और फैंटेसी में जी भी लेता हूं। मैं स्टेफी ग्राफ का दीवाना था। मैं बेहद परेशान हुआ था, जब उसने गंजू आंद्रे अगासी से शादी करने का फैसला किया था। मैं सोचता था कि विलियम बहनें बिस्तर पर क्या कर रही होंगी। या उन रूसी लड़कियों के बारे में सोचता रहा, जो फ्रेंच ओपन के फाइनल में खेली थीं। मैं यह भी सोचता रहता हूं कि काश कोर्ट पर चीखने-चिल्लाने पर पाबंदी हो।

मैं पीट सैंप्रस से सहमत हूं कि फेडरर अब तक दुनिया का सबसे बड़ा खिलाड़ी है। मेरी टेनिस फैंटेसी हैदराबाद की हाजी खानम के बिना पूरी नहीं हो सकतीं। वह बैले डांसर की तरह कोर्ट पर नजर आती थी। अब मुझे सानिया पसंद है। मेरी इच्छा है कि एक बार वह शादी से पहले टॉप पर पहुंच जाए।

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