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मेघ कृष्ण का इंतजार

ये आषाढ़ चल रहा है क्या? मैंने आकाश की ओर देखते हुए अपने-आप से पूछा। आधे से ज्यादा निकल गया आषाढ़। लेकिन मेघ नहीं आए। एक-दो बार हल्के-फुल्के मेघ आए भी तो लगा चिढ़ाने के लिए आए हैं। तपन बढ़ती जा रही है। सुबह और शाम की हवा में भी ठंडक नहीं बची है। मेघ को न जाने किसने रोक लिया है?

आमतौर पर आषाढ़ का महीना ऐसा तो नहीं होता? यह तो तपती धरती की प्यास मिटाने वाला महीना है। धरती कितना तपती है। तब कहीं जा कर मेघ दर्शन होते हैं। अब तक तो मेघ आ जाते हैं, लेकिन अभी तो..।

आषाढ़ के देवता कृष्ण हैं। मेघ में उनकी छवि देखी जाती है। मेघ कृष्ण। वह परमप्रभु हैं। और जीव की तपन को मिटाने चले आते हैं। गोपियां जीव ही हैं न। वह किस कदर अपने कृष्ण-कन्हैया के लिए तरसती हैं। शास्त्रीय ग्रंथों में आषाढ़ के देवता कृष्ण हों या न हों, लेकिन लोक गीतों में तो वही आषाढ़ के देवता हैं। लेकिन आषाढ़ के गीतों में कृष्ण की प्रार्थना कहां हैं? वहां तो उनसे शिकायत ही शिकायत है। मेघ नहीं आ रहे हैं तो शिकायत। मेघ आ रहे हैं तो शिकायत। क्या मौसम है? क्या माहौल है? लेकिन गोपियों के पास नहीं हैं कृष्ण। तब गोपियां कुब्ज पर पिल पड़ती हैं। गोपियां यहां उनकी बाट जोह रही हैं। और कृष्ण हैं कि कुब्ज के संग जी रहे हैं। वे उलाहना देती हैं। वाह रे कृष्ण, राधा को छोड़ कुब्ज के संग। सचमुच आषाढ़ के ये मेघ गोपियों को शांत नहीं कर रहे हैं। उन्हें तपा रहे हैं।

एक मायने में प्रकृति और पुरुष की लीला का महीना है यह आषाढ़। परम पुरुष है कृष्ण और प्रकृति हैं राधा। धरती तो राधा भाव है। इसीलिए राधा अपने कृष्ण के लिए व्याकुल हो रही हैं। कृष्ण को उनकी तपन मिटाने के लिए आना चाहिए। कृष्ण को आना ही होगा।

लोकगीतों में कही-कहीं कृष्ण-प्रिया भाव नहीं वात्सल्य भाव भी मिलता है। ऐसे में राम आते हैं। कौशल्या मां परेशान हैं। मेघ को देख कर वह बेचैन हो जाती हैं। अरे, मेरे राम, सीता और लक्ष्मण भीग रहे होंगे। लेकिन आषाढ़ का अंदाज कृष्ण के ही आस-पास पड़ता है।

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