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तस्कर, माओवादी, आतंकी सबके लिए खुला है इंडो-नेपाल बॉर्डर

अप्रवासन यानी इमीग्रेशन यानी एक ऐसी चेकपोस्ट जहाँ विदेशियों को अपनी पहचान के साथ आने का मकसद, पासपोर्ट और वीजा आदि की जांच करानी पड़ती है पर इंडो-नेपाल बॉर्डर पर शायद इसका कोई मतलब ही नहीं है। इस संवाददाता ने बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और महाराजगंज जिलों से सटी इंडो-नेपाल सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था की जो फजीहत देखी, उससे साफ महसूस हुआ कि यह सभी सीमाएँ माओवादियों, तस्कर, आतंकी और जासूसों के भारत प्रवेश को रोक पाने में कतई सक्षम नहीं हैं।

नेपाली जिले दांग और बलरामपुर जिले के बीच कोयलावासा, नेपाल के कृष्णानगर व बढ़नी सिद्धार्थनगर और सोनौली बॉर्डर पर आंतरिक सुरक्षा को लेकर देश की ज्यादातर एजेसिंयाँ संवेदनशील नहीं हैं। दोनों देशों के बीच 1950 में हुई मैत्री सन्धि की आड़ में खतरनाक अनदेखी हो रही हैं। सारी गड़बड़ियों को पैसा लेकर होने दिया जा रहा है। इसमें कोई एजेन्सी पीछे नहीं।

इसे साबित करने वाले कई उदाहरण सामने आए। मसलन कोयलावासा में नेपाली पुलिस चौकी घोराही के प्रभारी भारतीय बीएसएनएल मोबाइल इस्तेमाल करते मिले। यह सिम किसके नाम और कैसे लिया गया, इसकी कोई पड़ताल नहीं होती। यही स्थिति सोनौली बॉर्डर पार करने के बाद नेपाल के भरवा इलाके में देखने को मिली जहाँ बीएसएनएल के सिम पैंसठ-पैंसठ रुपए में खुलेआम बिक रहे थे।

यहाँ सोनौली चौकी के भारतीय पुलिस इंचार्ज के हाथ में नेपाली दूरसंचार कंपनी को फोन दिखा। उनके मुताबिक यहाँ जैमर लगा है जिससे बीएसएनएल नहीं मिलता पर सीमा पार कर के नेपाल में जाइए तो लाइन काम करने लगती है। इस संवाददाता ने तीनों बॉर्डरों पर देखा कि नेपाली युवक अपनी मोटरसाइकिल में दोनों तरफ से लिखी नम्बर प्लेट रखते हैं। भारत में घुसते ही भारतीय नम्बर वाली प्लेट दिखती है और नेपाल में नेपाली। यह बात एसएसबी, पुलिस व अन्य खुफिया एजेन्सियों के लोगों को मालूम है पर सब खुलेआम चल रहा है।

बढ़नी और कोयलावासा में इमीग्रेशन चौकी निष्क्रिय हैं। बलरामपुर जिले की चौकी में मौजूद पुलिस वालों ने बताया कि चौकी खुली जरूर है पर यहाँ इमीग्रेशन चैक का काम नहीं होता। यहाँ तैनात लोग लोकल इंटेलिजेंस से जुड़ी सूचनाएँ जुटाने के लिए हैं। बढ़नी में तो चौकी ही नजर नहीं आई। सीमा के उस पर जरूर नेपाली पुलिस वाले खड़े नजर आए वरना इधर तो कोई नहीं था। जो कुछ लाना हो लाइए, जिसको भी आना हो आए, किसी की जांच तक नहीं होती।

सोनौली में जरूरी इमीग्रेशन चेकपोस्ट पर रजिस्टर आदि के साथ कुछ लोग नजर आए पर यहाँ भी जो विदेशी अपनी जांच कराना चाहते हैं, उन्हीं की जांच होती है। यह अनिवार्यता नहीं है कि हर विदेशी की जांच हो। यहाँ के नो मैन्सलैंड में गाड़ियों की पार्किग होती नजर आई। सुरक्षा कैमरा बेकार पड़ा था।

खुफिया एजेन्सियों से जुड़े लोगों का कहना है कि सेफ बॉर्डर मैनेजमेंट के लिए बड़े पैमाने पर फेरबदल की जरूरत है। मसलन एसएसबी की चौकियाँ बढ़ाई जानी चाहिए, इमीग्रेशन को प्रभावी करना होगा, सीमा पर घूसखोरी कर रहे लोगों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है और इंट्रीगेटेड चेकपोस्ट जल्दी शुरू की जानी चाहिए।

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