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नीतीश सरकार की पहल रंग लायी,न्यायिक सेवा में पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित को आरक्षण

नीतीश सरकार की पहल से पंचायत और स्थानीय निकाय के बाद अब राज्य न्यायिक सेवा में भी पिछड़ा, अति पिछड़ा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग को आरक्षण मिल ही गया। शुक्रवार को उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के विधानसभा स्थित कक्ष में इस पर गंभीर चर्चा चली। चर्चा में श्री मोदी के साथ ही कुछ विधायक भी शामिल हुए।

यह बताया गया कि पिछली राजद सरकार चाहती तो यह काम पहले भी हो सकता था। वर्ष 2001 में तत्कालीन राबड़ी सरकार ने हाई कोर्ट से इस संबंध में बिहार न्यायिक सेवा नियमावली में संशोधन पर मन्तव्य मांगा था। करीब चार सालों तक इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई और वर्ष 2005 में हाईकोर्ट ने असहमति जतायी। तब सरकार ने फिर से हाईकोर्ट से पुनर्विचार का अनुरोध किया।

इस पर हाईकोर्ट ने सरकार को बताया कि न्यायिक सेवा में सभी वर्गो की पर्याप्त भागीदारी है। पिछड़ा और अति पिछड़ा 15.36 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 8 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की भागीदारी 0.23 फीसदी है। फिर मामला जहां था वहीं रह गया।

इसके बाद बिहार में नीतीश सरकार ने सत्ता संभाला और इस दिशा में कार्रवाई शुरू की। बिहार लोक सेवा आयोग ने जब 27वीं बिहार न्यायिक सेवा परीक्षा करवाने का निर्णय किया तो राज्य सरकार ने राज्य न्यायिक सेवा में पिछड़ा, अति पिछड़ा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग को आरक्षण देने का प्रस्ताव पर उनसे सहमति मांगी जिसपर वह तैयार हो गया।

इसके बाद सरकार ने तेजी से कार्रवाई कर इसे अंतिम परिणति तक पहुंचाया है। सुशील मोदी ने बताया कि इस तरह की व्यवस्था उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, छतीसगढ़, झरखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड में पहले से है।

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  • Web Title:राज्य न्यायिक सेवा में वंचितों को आरक्षण