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हजारों वर्ष पुराना है कटरा नील

हजारों वर्ष पुराना है कटरा नील

यदि यह कहा जाए कि चांदनी चौक दिल्ली का दिल है और चांदनी चौक की नब्ज ऐतिहासिक कटरा नील में धड़कती है तो अतिश्योक्ति न होगी। वास्तव में कटरा नील पुरानी दिल्ली के प्राचीनतम क्षेत्रों में गिना जाता है। एक समय था जब यहां एक स्थान पर नील बनाया जाता था और उसकी बिक्री होती थी, जिसके कारण इसका नाम कटरा नील पड़ा। 

चूंकि एक समय यमुना नदी इस कटरे से बहुत दूर नहीं बहती थी, यहां पर एक गली धोबियान भी हुआ करती थी। इसके निकट ही गली तेलियान भी थी। आज कटरा नील के महत्त्वपूर्ण स्थानों में गली घण्टेश्वर में घण्टेश्वर मंदिर और हकीम माम चन्द अरोड़ा की मुगल शहंशाह बहादुर शाह जफर के समय से स्थापित और उसी शक्ल में मौजूद सुरभि ट्रेडिंग भी है, जिसमें पूजा सामग्री और खालिस विशेष नुस्खों वाली हर्बल मेंहदी उपलब्ध है। यहां की पूजा सामग्री का भी जवाब नहीं, जो शुद्घ एवं सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।

कटरा नील के पीछे वाले भाग, जिसे बाग दीवार के नाम से जाना जाता है, आज भी जानी-मानी सब्जी मंडी बनी हुई है। कहने को तो यह सब्जी मण्डी है, मगर यहां पर नारियल और खोये की मण्डी भी है, जहां सादा और दानेदार खोया बोली लगा कर तुरन्त बिक जाता है। दिल्ली के अधिकतर मिठाई वाले यहां सवेरे से ही पहुंच कर बढि़या से बढि़या खोये को अपनी दुकानों में ले आते हैं।

यही नहीं, कटरा नील में आजकल कपड़ा मण्डी भी बन गई है, जो कृष्णा क्लॉथ मार्केट तक चली जाती है। यहां के पुराने निवासी रजनीश बताते हैं कि कुछ खत्री परिवारों ने कटरा नील में कपड़े का कारोबार शुरू किया था, जो आज इतना बढ़ गया कि यह कटरा अब एशिया की सबसे बड़ी कपड़ा मण्डियों में गिना जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि एक दिन में कटरा नील में लगभग दस से बीस करोड़ का कपड़ा बिक जाता है। यहां के कपड़े की विशेषता यह है कि यह चीप एण्ड बैस्ट होता है। यदि आप चान्दनी चौक जाएं तो कटरा नील का एक चक्कर लगाना हरगिज न भूलें। 

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