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भारतीय सिनेमा ने किया डिजिटल सिनेमा का रूख

भारतीय सिनेमा ने किया डिजिटल सिनेमा का रूख

भारत में फिल्मों के प्रदर्शन के लिए मल्टीप्लेक्सों के आगमन से जहां सिनेमाघरों के रंग रूप बदले हैं, वहीं अब तकनीक भी बदलने जा रही है और इन मल्टीप्लेक्सों में भारी भरकम प्रोजेक्टरों के स्थान पर डिजिटल सिनेमा प्रणाली को स्थापित किया जा रहा है।
  
सिनेमाघरों में प्रोजेक्टरों के स्थान पर डिजिटल सिनेमा प्रणाली अपनाने का विचार अनायास ही नहीं आया। सत्तर के दशक से ही किसी ऐसी प्रणाली की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही थी जिससे सिनेमा को निगेटिव फिल्म और रील पर उतारने और फिर उसे प्रोजेक्टर के जरिये पर्दे पर पेश करने की जटिल प्रक्रिया से बचा जा सके।

फिल्म निर्माता संदीप मारवाह ने कहा कि सत्तर के दशक की यादगार फिल्म शोले को कौन भूल सकता है जिसे देखने के लिए सिनेमाघरों पर दर्शकों का हूजूम उमर पड़ा था । लेकिन उस समय फिल्मों के प्रदर्शन के लिए रील की कमी पड़ गई थी। इसके कारण फिल्म का एक हिस्सा एक सिनेमाघर में दिखाने के बाद उसे दूसरे सिनेमाघर में भेजा जाता था। छोटे शहरों में सिनेमाघरों को तो और भी मुश्किल का सामना करना पड़ा था।

उन्होंने कहा कि आज इस परेशानी से बचने के लिए सिनेमाार विशेष तौर पर मल्टीप्लेक्सों ने डिजिटल सिनेमा प्रणाली का रूख किया है। इसके कारण न न केवल फिल्मों का वितरण आसान और सस्ता हो जायेगा बल्कि 70़़80 किलोग्राम के रीलों को लैब से सिनेमाघरों तक ले जाने की परेशानी से भी बचा जा सकेगा।

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