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केरल: झगड़े में उलझी माकपा की उलझन

यही माना गया कि पार्टी में आपसी टकराव बहुत ज्यादा था। इस चुनाव में माकपा की अगुवाई वाले वार्म मोर्चे ने केरल में दो दशक का सबसे बुरा प्रदर्शन किया। उसे 20 में से सिर्फ चार सीट ही मिलीं। बंगाल में भी पार्टी की हालत ज्यादा अच्छी नहीं रही, लेकिन केरल का मामला ज्यादा जटिल है और इसके लिए चार और पांच जुलाई को बैठक बुलाई है।


केरल की हार का कारण किसी से छुपा नहीं है। ये कारण इसके खुद ही के बनाए हुए हैं। कारण दो तरह के हैं, एक तो पिछले साल सरकार का कामकाज काफी लचर रहा है और दूसरा कारण है मुख्यमंत्री और पार्टी के महासचिव के गुटों का झगड़ा। दोनों ही कारण एक तरह से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।


यह पार्टी प्रमुख और सरकार प्रमुख के बीच का झगड़ा है। मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन और पार्टी के राज्य महासचिव पिनाराई विजयन केरल में पार्टी की दो आंखों के समान रहे हैं। एक करिश्माई नेता हैं तो दूसरे संगठनकर्ता। ये दोनों पार्टी को हैसियत और लोकप्रियता दिला सकते हैं, बशर्ते कि वे साथ मिलकर चलें।
लेकिन पार्टी के लिए समस्या को समझना जितना आसान है, इसका समाधान उतना ही कठिन है। पार्टी किसी एक नेता के लिए दूसरे को दबा या झुका देने का खतरा मोल नहीं ले सकती। हाल तक दोनों के बीच सुलह सफाई के जो तरीके अपनाए जते थे, वे अब किसी भी काम के नहीं रहे। पिछले कुछ समय में माकपा का केंद्रीय नेतृत्व इस मामले को सुलझने में ही इतना उलझ रहा कि वह यह समझ ही नहीं पाया कि जमीन पर हालात कितने बिगड़ रहे हैं।


एक ऐसी धारा जिसका मूलमंत्र ‘पार्टी ही सर्वोच्च’ है, वहां व्यक्ितत्व के आधार पर ही सब कुछ हो रहा है। माकपा की यही बड़ी मुश्किल है। अब वह मुख्यमंत्री को पार्टी महासचिव से ज्यादा अहमियत तो दे नहीं सकती। वह इसका उल्टा भी नहीं कर सकती। अच्युतानंदन की छवि एक स्वच्छ नेता की है, जो भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहता है। अच्युतानंदन को अपनी छवि इस कदर प्यारी है कि इसके लिए वे अक्सर पार्टी हितों की भी अनदेखी कर देते हैं।
जब से सीबीआई ने एसएनसी लवेलिन मामले में महासचिव विजयन के खिलाफ चाजर्शीट दायर की है, तब से मुख्यमंत्री अच्युतानंदन यह मांग कर रहे हैं कि मामले से बरी होने तक के लिए विजयन को पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। इस मामले में जनता की राय मुख्यमंत्री के साथ है। लेकिन पार्टी संगठन विजयन के साथ लगभग पूरी तरह एकजुट होने के कारण उनके खिलाफ कार्रवाई की बात सोची भी नहीं ज सकती। अगले दो साल के भीतर ही पार्टी को राज्य में पंचायत चुनाव भी लड़ना होगा और विधानसभा चुनाव भी। और अगर इन दोनों नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती तो इन चुनावों में इसका पूरा फायदा विपक्ष को मिलेगा। इसी पार्टी ने कुछ ही समय पहले नैतिक आधार पर यह कहा था कि लालू यादव जब तक आरोपों से बरी नहीं हो जते, उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। लेकिन अपनी पार्टी के किसी नेता के भ्रष्टाचार के मामले में अलग ढंग से बर्ताव करना पार्टी के नैतिकता के दावे को तो झूठा साबित करेगा ही।


पार्टी संगठन में विजयन के पास जिस कदर समर्थन है, उसके चलते उनका इस्तीफा मांगना परेशानी भरा काम है। वसे मुख्यमंत्री ने भी विजयन का इस्तीफा सीधे-सीधे नहीं घुमा-फिरा कर ही मांगा है। उन्हें पता है कि सीधे इस्तीफा मांगने पर पार्टी में उन्हें खासी दिक्कत होगी। अच्युतानंदन की दिक्कत इसलिए भी बढ़ गई है कि मंत्रिमंडल ने लवेलिन मामले में विजयन के खिलाफ कार्रवाई का फैसला किया था, बाद में खुद अच्युतानंदन ने ही इसे लागू नहीं किया तो पूरे मंत्रिपरिषद् ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की। अब मंत्रिमंडल के इसी फैसले की वजह से विजयन के समर्थक मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

अब कड़ी परीक्षा माकपा के केंद्रीय नेतृत्व की होगी। केरल में पार्टी के दो गुटों का झगड़ा सुलटाना उसके लिए इतना आसान नहीं होगा। अगले कुछ दिनों के अंदर ही पार्टी को ऐसा फैसला लेना होगा, जिससे स्थायी समाधान भी निकल आए और पार्टी की साख फिर से राजनीति की पटरी पर वापस आ जए।

radhaviswanath73@yahoo.com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

 

 

 

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