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विधेयक के विरोधियों को नजरंदाज करें

महिला आरक्षण बिल में क्या किसी की कोई दिलचस्पी है? जो लोग इस बिल को लेकर बहुत उत्साहित थे वे भी लंबे समय से लंबित इस बिल के खिलाफ बरसों से वही घिसी-पिटी दलीलें सुनते-सुनते उकता गए हैं। इस बिल पर किसी पार्टी की लाइन जो भी हो, अधिकांश महिला राजनीतिज्ञ इस बात पर एकमत हैं कि यह बिल आना ही चाहिए। केवल समाजवादी पार्टी की जयाप्रदा और भारतीय जनशक्ति पार्टी की उमा भारती इसका अपवाद हैं। जिन पुरुष राजनीतिज्ञों ने शुरू में इसका विरोध किया था, वे अब भी अपनी बात पर अड़े हुए हैं। तीनों यादव नेता अपना  पुराना राग अलाप रहे हैं और महिला आरक्षण के वर्तमान प्रारूप को पास न होने देने के खिलाफ कमर कसे हुए हैं।


पिछली बार जब यह बिल पेश किया गया और संसदीय समिति को सौंपा गया, तब से इस बार हालात में एक बड़ा अंतर यह है कि सरकार को संसद में दो-तिहाई समर्थन प्राप्त है। ऐसे में  बिल के विरोधियों के तर्को और धमकियों को नजरअंदाज कर इसे पारित किया ज सकता है।


वसे एक दिन में या सरकार की घोषणा के अनुसार सौ दिन में इस बिल को पास करना संभव नहीं दिखता है। बिल फिलहाल संसदीय समिति के पास है और लोकसभा चुनाव के बाद समिति का पुनर्गठन होना है। विधि और न्याय संबंधी नई संसदीय समिति के गठन में समय लगेगा और जिस ढंग से कार्यवाही होती है, उसे देखते हुए जल्दी से जल्दी भी संसद के शीतकालीन सत्र से पहले बिल का आना संभव नहीं लगता। इससे पहले कोई समझोता भी संभव है।


बिल लाने की जल्दबाजी में सरकार इसका मौजूदा स्वरूप ही बनाए रख सकती है। अगर बिल पर रचनात्मक बहस होगी, जिसकी कोई गुंजइश नहीं है तो यह एक बार फिर सुझवों और सिफारिशों के लिए कमेटी में जा सकता है। संसद में पेश किए जने के बाद अगर इस पर पहले की तरह अड़ंगेबाजी लगाई गई और कोई बहस नहीं हुई, तो सरकार इसे वापस कमेटी में भेज सकती है। अगर बिल पर विरोध के बावजूद बहस हुई तो बिल अपने मौजूदा स्वरूप में पारित हो  सकता है।


अगर सरकार बिल के मसौदे पर दिए गए सकारात्मक सुझवों को शामिल करने में विफल रही तो बिल का उद्देश्य ही खत्म हो जएगा। संसद में महिलाओं को आरक्षण देने का मुख्य कारण यह है कि महिलाओं को राजनीति में वह स्थान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। यहां तक कि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को चुनाव लड़ाने का वादा कर राजनीतिक दल उससे मुकर गए। इसी कारण राजनीति में महिलाओं की संख्या में पर्याप्त इजफा नहीं हुआ। इस बार  15वीं लोकसभा में पहले की तुलना में ज्यादा महिलाएं इसलिए चुनी गईं, जिसका कारण महिलाओं की सफलता दर पुरुषों से ज्यादा होना है। चुनाव से पहले अगर राजनीतिक दल यह सुनिश्चित करते कि उनकी एक तिहाई प्रत्याशी महिलाएं होंगी तो संसद में इस बार महिलाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिलती। वर्तमान स्थिति में राजनीति के क्षेत्र में अपनी जगह बनाने के लिए महिलाओं को खासी मशक्कत करनी पड़ती है, खासकर उन्हें, जिनके परिवार का राजनीति से कोई संबंध नहीं है। ऐसी महिलाओं को भारी कठिनाइयों से जूझना पड़ता है।


महिला आरक्षण लागू होने के बाद राजनीति में उनकी संख्या अपने आप बढ़ जएगी। लेकिन क्या इससे उनकी स्थिति में कुछ मूलभूत अंतर आएगा? संसद और विधानसभाओं में जो महिलाएं चुन कर आएंगी वे कौन होंगी? यादव नेताओं का तर्क है कि आरक्षण से केवल संपन्न महिलाओं का ही सशक्तीकरण होगा। यह बात तो आरक्षण कानून लागू होने के बाद ही प्रमाणित हो सकती है।


पंचायत और नगरपालिका चुनाव व्यवस्था में सीटों के रोटेशन का परिणाम संतोषजनक नहीं कहा ज सकता। 73वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ, लेकिन हर चुनाव के बाद सीट बदल जने से कोई महिला एक क्षेत्र से दुबारा चुनाव नहीं लड़ सकती। पंचायती राज मंत्रालय द्वारा किए गए एक अध्ययन के बाद इस व्यवस्था को बदले जने की सिफारिश की गई है। अध्ययन के अनुसार अभी केवल 15 प्रतिशत महिलाएं ही दूसरी बार चुने जने में सफल रही हैं।


ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पुरुष राजनीतिज्ञों का निर्वाचन क्षेत्र जब महिलाओं के लिए आरक्षित हो गया तो उन्होंने अपनी पत्नी या किसी महिला संबंधी को अपने क्षेत्र से चुनाव लड़ा दिया। अगली बार सीट से आरक्षण का प्रतिबंध हट जने पर वे स्वयं चुनाव में खड़े हो जते हैं और पिछली बार जीती महिला को चूल्हे-चक्की के काम में लगा देते हैं। इससे आरक्षण का मूल उद्देश्य विफल हो जता है और यह व्यवस्था मखौल बन जती है। केवल कुछ ही
महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने पहले महिला कोटे से और इसके बाद सामान्य सीट से भी चुनाव जीता है।


महिला आरक्षण विधेयक पर अनेक वकल्पिक सुझव दिए गए, लेकिन रोटेशन व्यवस्था के अतिरिक्त कोई विकल्प आसान नहीं लगता। महिला आरक्षण विधेयक को अंतिम रूप देने से पहले स्थानीय प्रशासन स्तर पर लागू महिला आरक्षण के अनुभवों से सबक सीखना जरूरी है।


अपने देश में हम प्रतीकों पर गर्व करते हैं। हमारे देश में राष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष के पद पर महिलाएं आसीन हैं। कुछ प्रमुख राष्ट्रीय दलों की अध्यक्ष भी महिलाएं हैं, जो काफी ताकतवर हैं। लेकिन महिला सशक्तीकरण के लिए इतना होना ही काफी नहीं है। वर्तमान प्रतीकों की सार्थकता तभी है, जब सभी महिलाओं के लिए ठोस कार्यक्रम बनाए जएं। महिलाओं को आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा के साथ-साथ इस बात की गारंटी भी दी जए कि उनकी जति और वर्ग की परवाह किए बिना उनकी बात सुनी जएगी।     
   

kalpu.sharma@gmail.com

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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