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वर्षा के पहले बादल

वर्षा का पहला बादल नदारद है। आषाढ़ की तिथियां निकलती जा रही हैं। आसमान में एक सुरमई लकीर तक नजर नहीं आ रही। शायद बादलों ने तौबा कर ली है। सोचते होंगे सदियों से रोते-झींखते प्रेमी-प्रेमिकाओं के साथ बहुत रोए। अब एसएमएस, मिस्ड कॉल, ब्लॉगिंग, फेसबुक न जने क्या-क्या के जमाने में बिछड़े के लिए कौन रोने बैठता है। आज के यक्ष पीछे मुड़ कर नहीं देखते। मेघराज! तुम नाराज हो गए हो क्या? भाई रे किसान के बच्चों की गुहार ही सुनो : काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे, बरसों राम धड़ाके से, बुढ़िया मर गई फाके से, रब्बा-रब्बा मीं वसा, साडी कोठी दाणो पा। तीतर के पंखों जसी बदलियों को देखकर बड़े-बूढ़े कहा करते थे- ‘तितर खम्भी बदली ते रन मलाई खा, ओ बरसे ओ उछलें ते बचन न बिरथा ज’। रसोई घर में मलाई चट कर जाने वाली गृहिणी ‘उछल’ जती है यानी किसी के साथ भाग जती है। जब तक वह सबको खिलाती रहती है, तब तक अन्नपूर्णा, ज्यों ही मन ललचाया तो कुलटा का खिताब पा जाती है।

बादल के बहाने कैसा अचूक निशाना साधते थे लोग! पर इस मेघविहीन आकाश का क्या करें? पारा 44 पार कर रहा है। प्रकृति के इस व्यतिक्रमा का कारण क्या है? अनुशासन की मिसाल बनते-बनते आज वह गुमराह कैसे हो गई। या फिर हम ही भटक गए हैं। अपने सुखों के लिए वातावरण में कितना जहर घोल रहे हैं। गंगा जैसी नदियां नाले को भी अपने में मिला कर पवित्र कर देती थीं। आज वे स्वयं नाला बन गई हैं। पहाड़ वृक्ष विहीन होते ज रहे हैं और धरती कूड़ा घर।


रूठों को मनाने के लिए क्या-क्या जतन करने पड़ते हैं। नागपुर के ‘फुटाला’ गांव में मेंढक राज और रानी का वदिक विधि-विधान से विवाह करवाया गया। रानी तो सुभीते से मिल गई पर राज जी की छलांगों से पार पाना कसाले का काम था। देखें इन्द्रदेव इससे बहलेंगे या नहीं। मान भी जाओ मेघराज।

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