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पोखरियाल की ताजपोशी

उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल का उपनाम ‘निशंक’ है, लेकिन इस बात की संभावना कम ही है कि वे निशंक हो कर राज कर लेंगे। जो भी लोग उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में भागीदार हैं, उन्हें यही उम्मीद है कि पोखरियाल काफी चतुर राजनेता हैं और स्थिति संभाल लेंगे। भुवन चंद खंडूड़ी काबिल और ईमानदार प्रशासक हैं, लेकिन उनमें वह राजनैतिक चतुराई और लचीलापन नहीं था, जो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री होने के लिए जरूरी था। वे लालकृष्ण आडवाणी की पसंद होने की वजह से मुख्यमंत्री बने थे, जबकि सत्तर सदस्यों की विधानसभा में भाजपा ने 34 सीटें जीती थीं और जीते हुए काफी विधायक भगत सिंह कोश्यारी के समर्थक थे। भगत सिंह कोश्यारी तब से लेकर अब तक खंडूड़ी के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाए ही रहे और खंडूड़ी भी पार्टी की अंदरूनी राजनीति को अपने पक्ष में करने में नाकाम रहे। लोकसभा चुनावों में प्रदेश की पांचों सीटों पर भाजपा की हार ने खंडूड़ी का जना तय कर दिया और खुले विद्रोह की वजह से कोश्यारी का मुख्यमंत्री न बनना तय हो गया, क्योंकि केन्द्रीय नेतृत्व स्पष्ट अनुशासनहीनता को पुरस्कृत करने से बचना चाहता था। कोश्यारी, खंडूड़ी को हटाने में कामयाब रहे और खंडूड़ी अपने विश्वसनीय पोखरियाल को मुख्यमंत्री बनाने में। लेकिन समस्या यह है कि यह सिर्फ एक राज्य की समस्या नहीं है, लोकसभा चुनावों में हार के बाद भाजपा में जो सत्ता संघर्ष चल रहा है, यह उसी का एक अंग भी है। इस वक्त केन्द्रीय स्तर पर जो भी इंतजम हैं, वे तदर्थ हैं और इस साल के अंत में सत्ता समीकरणों का फैसला होगा। सारे लोग उसकी तैयारी में अपने विरोधियों को अस्थिर और कमजोर करने में लगे हैं और उत्तराखंड की लड़ाई को भी उसी संदर्भ में देखा जना चाहिए। इससे यह पता चलेगा कि पोखरियाल के लिए प्रशासनिक चुनौतियां तो होंगी ही, राजनैतिक मोर्चे पर भी उन्हें कई चुनौतियां ङोलनी पड़ सकती हैं। कोश्यारी का गुट पोखरियाल के मुख्यमंत्री बनने से खुश नहीं है, हालांकि पोखरियाल को हटाना उन्हें फिलहाल मुश्किल होगा। केन्द्रीय स्तर पर सत्ता संघर्ष का असर भी उत्तराखंड की राजनीति पर पड़ेगा ही और इस सब के बीच में राज्य में पार्टी को मजबूत बनाना कितना मुश्किल है, इस बारे में पोखरियाल से बेहतर कौन जनेगा?

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  • Web Title:पोखरियाल की ताजपोशी