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कैदियों के लिए नर्क है 123 देशों की जेलें

कैदियों के लिए नर्क है 123 देशों की जेलें

संयुक्त राष्ट्र में लोगों या कैदियों को यातनाएं दिए जाने के विरोध में बहुत से प्रस्ताव और कानून पारित होने के बावजूद आज भी दुनियाभर के तमाम देश इस बुराई का इस्तेमाल कर रहे है। कहीं अपराधियों से सच उगलवाने के नाम पर तो कहीं नागरिकों को नियंत्रण में रखने के नाम पर सरकारी एजेंसियां यातना का हथकंडा अपनाती हैं।

इराक की अबू गरेब जेल हो या फिर अमेरिका के कब्जे वाली ग्वांतानामो बे जेल, दुनियाभर की ऐसी तमाम जगह कैदियों को प्रताड़ित किए जाने के लिए कुख्यात रही हैं। कभी व्यक्ति सरकारी एजेंसियों की यातना का शिकार बनता है तो कभी उसे विद्रोहियों, आतंकवादियों और समाज विरोधी तत्वों द्वारा दी जाने वाली यातना झेलनी पड़ती है। मानव सभ्यता के दुश्मन तालिबान और अलकायदा जैसे संगठन अपनी बात न मानने वालों का जहां सिर कलम कर डालते हैं, वहीं ये संगठन महिलाओं द्वारा नेल पॉलिश का इस्तेमाल किए जाने पर उनके नाखून तक उखाड़ देते हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता और जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण का कहना है कि दुनियाभर में किसी भी देश के कानून में यातना की इजाजत नहीं दी गई है, लेकिन फिर भी इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। भूषण के अनुसार दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों और अदालतों का लचीला रुख भी यातना दिए जाने का एक बहुत बड़ा कारण है। उन्होंने कहा कि यदि यातना देने वाले सरकारी नुमाइंदों को लंबे समय तक जेल में रखा जाए तब स्थिति में कुछ सुधार आ सकता है। भूषण ने कहा कि भारत में भी स्थिति खराब है। अमेरिका और भारत ने यातना विरोधी संधि पर हस्ताक्षर नहीं कर रखे हैं।

टार्चर सर्वाइवर्स नेटवर्क के अनुसार आधुनिक जमाने में भी दुनिया के कम से कम 123 देश अपने नागरिकों को नियंत्रण में रखने के लिए टार्चर का इस्तेमाल करते हैं। संयुक्त राष्ट्र 1945 में अपनी स्थापना के समय से ही यातना को खत्म कराए जाने के लिए काम करता रहा है, लेकिन उसे आज तक सफलता नहीं मिल पाई है। 10 दिसंबर, 1984 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 39. 46 के तहत कन्वेंशन अगेंस्ट टार्चर (कैट) संधि को स्वीकार किया। यह संधि 26 जून, 1987 से प्रभाव में आई। 1997 में डेनमार्क के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने हर साल 26 जून को टार्चर पीड़ितों के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने की घोषणा की।

कैट संधि के अनुच्छेद 1 के अनुसार नींद से वंचित करना, बिजली के झटके लगाना, पानी में सिर डुबो देना, चिकित्सा आधार पर जानबूझकर मनोरोगी अस्पताल में भर्ती करा देना, नशीली वस्तुएं देना, भूखे रखना, अधिक सर्दी या धूप में नंगे बदन व्यक्ति को खड़ा कर देना और नियमित पिटाई जैसी सभी चीजें यातना के दायरे में आती हैं।

मई 2002 में कैट के तहत छह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियां और हुई, जिन पर 128 देशों ने हस्ताक्षर किए। पाकिस्तान, भूटान, ब्रुनेई, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, उत्तर कोरिया, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम इन संधियों में शामिल नहीं हुए। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के अनुसार पश्चिम और यूरोप सहित पूरी दुनिया में संधियों के बावजूद यातना देने का क्र्रम जारी है। दक्षिण एशिया में यातना के मामले में जहां बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और भारत का नाम आता है तो वहीं पूर्वी एशिया में चीन, जापान और उत्तर कोरिया यातना देने वाले देशों की सूची में शामिल हैं।

दक्षिण पूर्व एशिया में बर्मा, इंडोनेशिया, मलेशिया और फिलीपींस का नाम यातना देने वाले देशों में शुमार है। मनोचिकित्सक ललित किशोर का कहना है कि आधुनिक युग में कैदियों से पूछताछ के कई मनोवैज्ञानिक तरीके ईजाद हो चुके हैं, इसलिए अब यातना की कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि अपराधियों से सच उगलवाने में नार्को परीक्षण, लाई डिटेक्टर और साइको एनालिसिस जैसे परीक्षण काफी कारगर साबित हो सकते हैं।

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