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आओ चलें गुडि़यों के घर

आओ चलें गुडि़यों के घर

दोस्तो, गुड्डे-गुडि़यों से खेलना तो तुम सभी को बेहद पसंद है, तो तुम्हें ऐसी जगह की सैर करने में तो बड़ा मजा आएगा, जहां चारों ओर जिधर भी निगाहें दौड़ाओ, तुम्हें गुडिया ही गुडिया नजर आएंगी। तुमसे बोलती, बतलाती अपनी दुनिया की किस्से कहानियां सुनाती हुई सी। हां, ऐसी ही एक जगह है दिल्ली का डॉल्स म्यूजियम। जानते हो इसे राजनीतिक कार्टूनिस्ट के. शंकर पिल्लई ने बनवाया था। इसके पीछे भी एक रोचक कहानी है। के. शंकर पिल्लई को हंगरी के एक राजदूत ने एक गुडिया उपहार में दी थी। वह उन्हें इतनी पसंद आई कि उन्होंने इसके बाद देश-विदेश की भिन्न-भिन्न गुडिया एकत्र करनी शुरू कर दीं। फिर इंदिरा गांधी की प्रेरणा से उन्होंने इस अनोखे संग्रह को एक म्यूजियम में रखने का निश्चय किया, जिससे उसे तुम्हारे जैसे सभी बच्चे देख सकें और खुश हों। परिणामस्वरूप आज इस म्यूजियम में एक से बढ़कर एक खूबसूरत अनोखी और सजी-संवरी गुडि़या हैं। इनमें एक गुडिया तो बेहद पुरानी यानी 1781 की है- स्लीपिंग स्विस डॉल- यह गुडि़या अपने नन्हे से बेड के साथ इस म्यूजियम में मौजूद है।

नेहरू हाउस में पहली मंजिल पर बने इस खूबसूरत, रोचक गुडि़यों के संसार को जब तुम देखने जाओगे तो तुम्हें इसकी बाहरी दीवारों पर सजी सुंदर रंग-बिरंगी कला भी नजर आएगी। म्यूजियम के अंदर पहुंचने पर तुम्हें चारों ओर गुडि़या ही गुडि़या नजर आएंगी। 6,000 डॉल्स के इस अद्भुत संग्रह में से लगभग एक तिहाई गुडि़या अकेले भारत की ही हैं। एक तरफ लगभग पांच सौ गुडि़या ऐसी हैं, जो भारत के भिन्न-भिन्न प्रांतों के पहनावों को प्रदर्शित करती हैं। बेहद खूबसूरत कॉस्ट्यूम्स और चमकते गहनों में सजी इन गुडि़यों के जरिए विभिन्न प्रांतों, उनके पहनावे, सांस्कृतिक मान्यताओं और वहां के मौसम के बारे में भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। म्यूजियम के दो भागों में से एक में यूरोपियन देशों और स्वतंत्र राज्यों और दूसरे भाग में एशियाई देशों की गुडिम्यां देखी जा सकती हैं। इनमें यूगोस्लाविया की प्रथम महिला मैडम टीटो द्वारा दी गई गुडि़या, ग्रीस की रानी फ्रेडरिका द्वारा दी गई और इंडोनेशिया की प्रथम महिला द्वारा  दी गई गुडिम्या भी देखी जा सकती है। प्रदर्शन में हंगरी की मेपोल डांसर गुडि़या, स्पेन की फ्लेमेंको डांसर, जापान की काबुकी और समुराई डॉल्स, जापान की ही बायन एंड गर्ल्स फेस्टिवल डॉल्स भी मौजूद हैं।

भारतीय सेक्शन इससे बिल्कुल भिन्न नजर आता है, जिसमें अधिकांश गुडि़यों में एक धार्मिक पहलू भी देखा जा सकता है। इनमें भगवान विष्णु की गुडि़या और भगवान के भिन्न-भिन्न मनोभावों को प्रदर्शित करती गुडि़या भी हैं।
 
भारत के विभिन्न नृत्यों को प्रदर्शित करती गुडि़या, भारत के विभिन्न प्रांतों की दुल्हनों की गुडि़या, स्त्री और पुरुष यानी जोड़े में भी गुडि़या मौजूद हैं। हर एक गुडि़या एक अलग कहानी कहती हुई प्रतीत होती है।

म्यूजियम के साथ जुड़े डॉल्स-वर्कशॉप को देखना भी एक मजेदार अनुभव होगा। भारतीय जीवनशैली को प्रदर्शित करती 150 स्टाइल्स की गुडि़यों के अलावा कुछ खास गुडि़यां भी यहां हैं। तुम यहां के कारीगरों की अद्भुत कारीगरी को देखकर उसे सराहे बिना नहीं रह पाओगे। मन को आकर्षित करती अद्भुत डॉल्स को तुम अपने सामने रंग-रूप लेते तुम देख सकते हो। हर गुडि़या को यहां पूरे रिसर्च के बाद उसके व्यक्तित्व के अनुरूप उचित पहनावे, आभूषणों और उनकी पूर्ण शारीरिक बनावट को ध्यान में रखते हुए बनाया जाता है। यहां से तुम अपने लिए अपनी मनपसंद गुडि़या खरीदकर उसे यादगार के तौर पर भी ले जा सकते हो।

देखना मत भूलना
बेहद पुरानी 1781 की स्लीपिंग-स्विस डॉल
सन 1800 के समय का आस्ट्रेलिया का पहनावा। आस्ट्रेलियन फैशन में यहां दर्शाए गए पहनावे के अनुसार अब के पहनावे में आया क्रांतिकारी बदलाव बेहद रोचक लगेगा।
विभिन्न देशों की गुडिम्यों को वहां की दुल्हन की पोशाक में देखना
हैरी-पॉटर को पसंद करने वाले बच्चों को उसी तरह की चुड़ैल के रूप में गु़डि़या देखना, जिसके साथ उसकी उड़ने वाली झाड़ू भी है, बड़ा मजेदार लगेगा।

स्थान- नेहरू हाउस, 4, बहादुर शाह जफर मार्ग
समय- 10 बजे से शाम 5.30 बजे
बंद- हर सोमवार
आकर्षण 85 देशों की विभिन्न तरह की 6,000 गुडि़यों का संग्रह
नेहरू हाउस में पहली मंजिल पर बने इस खूबसूरत, रोचक गुडि़यों के संसार को जब तुम देखने जाओगे तो तुम्हें इसकी बाहरी दीवारों पर सजी सुंदर रंग-बिरंगी कला भी नजर आएगी। म्यूजियम के अंदर पहुंचने पर तुम्हें चारों ओर गुडि़या ही गुडि़या नजर आएंगी।

 

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