class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

दो टूक

दिल्ली उन महानगरों में से एक है जहां सबसे ज्यादा औरतें अपने पांवों पर खड़ी हैं। सभी तबकों की औरतों का घर से निकलना और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनना शहर के प्रगतिशील नजरिये का प्रतीक होना चाहिए था। ऐसा नहीं है क्योंकि यहां औरतें ही सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं।

कभी उनसे थाने में बलात्कार होता है तो कभी किसी बस्ती में। शहर के वे आर्थिक हालात जो औरत को घर से बाहर निकलने के अवसर दे रहे हैं वे मर्दो पर अपना नजरिया बदलने के दबाव क्यों नहीं बना रहे? और फिर पुलिस जैसी जिन संस्थाओं को औरत के प्रति संवेदनशील होना चाहिए था वे इतनी क्रूर क्यों हैं? दिल्ली महानगर तो बन गई, उसका सभ्य होना अभी बाकी है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:दो टूक