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सांसद निधि पर राजनीति की फिसलन

हाल में बिहार से यह खबर आई है कि सांसद निधि में ‘कमीशन’ को लेकर हुए झगड़े ने एक की जान ले ली। जो सांसद-विधायक निधि पहले राजनीति में नैतिक गिरावट की उत्प्रेरक बनी, अब वही हत्याओं का भी कारण बन रही है।

इसके बावजूद सरकार चाहती है कि सांसद निधि की वार्षिक राशि दो करोड़ रुपये से बढ़ा कर पांच करोड़ कर दी जाय। संप्रग सरकार पर सन् 2004 से ही यह दबाव बनता आ रहा है कि इस फंड को चार करोड़ कर दिया जाए। तब मनमोहन सिंह सरकार ने यह तर्क दिया था कि सांसद निधि के तहत 21 सौ करोड़ से अधिक राशि अभी तक खर्च ही नहीं हो सकी है। फिर इसे बढ़ाने का क्या फायदा?

शायद सरकार को मालूम नहीं है कि एक बड़ी राशि इसलिए भी नहीं खर्च हो पाती क्योंकि कई सांसद यही तय नहीं कर पाते कि इस फंड का ठेकेदार अपने किस कार्यकर्ता या ठेकेदार को बनाएं। हालांकि ठेकेदार तय करने का अधिकार सासंद को नहीं हैं। पर अनौपचारिक रूप से जनप्रतिनिधि ही ठेकेदार तय करते हैं। हाल में एक दिलचस्प मामला देखने को मिला।

सांसद स्थानीय विकास कोष योजना की संवैधानिकता को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने ही वाला है। यदि निर्णय इस कोष को जारी रखने के पक्ष में आ गया तो काफी संभावना है कि केंद्र सरकार इस बार  इस राशि को बढ़ा कर चार या पांच करोड़ कर देगी। क्योंकि यह योजना अधिकतर सांसदों के बीच काफी ‘लोकप्रिय’ है। इसे समाप्त करने की हिम्मत किसी भी मिली जुली सरकार के मुखिया को नहीं होगी। इसे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार भी नहीं समाप्त कर सकी, जबकि उनसे साफ-साफ यह कहा गया था कि इस फंड में कमीशन के कारण संघ से प्रतिनियुक्ति पर भाजपा में आए कई स्वयंसेवक भी बेईमान हो रहे हैं।

हाल के वषरें में इस देश की राजनीति के नैतिक पतन के लिए यदि कोई एक कारण सर्वाधिक जिम्मेदार साबित हुआ है तो वह सांसद-विधायक क्षेत्र विकास निधि है। कुछ थोड़े से सांसद या विधायक इस फंड से कमीशन से न भी लेते हों पर दुरुपयोग के आरोप इतने हैं कि इसे लेकर आम जनता में आम सांसदों व विधायकों की इज्जत घटी है। इसके भ्रष्टाचार के कारण ब्यूरोक्रेसी पर से सांसदों और विधायकों की नैतिक धाक भी समाप्त हो रही है। इस निधि के पैसों में से कमीशन लेने वाले सांसदों और विधायकों में यह नैतिक साहस कहां बचेगा कि वे सरकार की ओर से चलाये जा रहे दूसरे विकास और कल्याण कायरें में बढ़ रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा सकें?

सांसद फंड की शुरूआत से पहले आम जनता अपने सांसदों-विधायकों से यह उम्मीद करती थी कि जरूरत पड़ने पर किसी प्रशासनिक भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए सांसद-विधायक की मदद ली जा सकती है। पर जब खुद अधिकतर सांसदों और विधायकों द्वारा ही संबंधित अधिकतर अफसरों से सांठ-गांठ करके इस फंड के दुरूपयोग की खबरें आने लगीं तो आम लोगों में  नेताओं और लोकतंत्र के प्रति आस्था कम होने लगी, जिसकी आशंका करीब छह साल पहले मन मोहन सिंह ने राज्य सभा में व्यक्त की थी।

यह फंड सन् 1993 में तब शुरू किया गया, जब नरसिंह राव मंत्रिमंडल को लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल नहीं था। उस सरकार को अनेक सांसदों को खुश करना था। इस संबंध में संयुक्त संसदीय समिति ने 23 दिसंबर 1993 को करीब 4 बजे अपनी सिफारिश सदन में पेश की और सरकार ने उसी दिन छह बजे उस सिफारिश को स्वीकार कर लेने के अपने निर्णय की घोषणा कर दी। जिस सरकार को कंधार विमान अपहरण और मुम्बई हमले की सूचना मिल जाने के बाद भी समय पर त्वरित कार्रवाई करने की चिंता नहीं होती, वह सरकार इस मामले में दो घंटे के भीतर ही निर्णय कर लेती है।

इस फंड के दूरगामी परिणाम की सूचना जनता को सिर्फ तभी ही नहीं मिली थी, जब मीडिया के स्टिंग ऑपरेशन के दौरान एक सांसद को इस फंड के एवज में कमीशन लेते लोगों ने अपने टेलीविजन पर देखा था। इससे पहले से भी इसकी बुराइयां सामने आने लगी थीं। महालेखा परीक्षक ने 1998 में ही इस फंड के भारी दुरूपयोग की रपट सरकार को दे दी थी।

इसीलिए जब इसे एक करोड़ से बढ़ाकर दो करोड़ कर दिय गया तो 10 मार्च 2003 को राज्य सभा में प्रतिपक्ष के नेता मनमोहन सिंह ने अटल सरकार से यह कहा कि ‘यदि आप चीजों को इसी रास्ते जाने देंगे तो जनता नेताओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास खो देगी।’ वीरप्पा मोइली के नेतृत्व में गठित द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने करीब दो साल पहले केंद्र सरकार से यह भी सिफारिश की कि वह सांसद विधायक निधि समाप्त कर दे। इसके बावजूद मनमोहन सरकार यह काम आज  तक नहीं कर सकी। मोइली आयोग की रपट पर भाकपा महासचिव एबी वर्धन ने कहा था कि ‘वाम दल शुरू से ही इस योजना के विरोधी रहे हैं।’

बेहतर चाल, चरित्र और चिंतन वाली अटल बिहारी सरकार से यह उम्मीद की गई थी। इसके लिए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से करीब चार दर्जन भाजपा सांसदों ने भेंट की थी। उन सांसदों ने उनसे कहा था कि यह फंड संघ के कॉडर को भी स्वयंसेवी से व्यावसायिक बना रहा है। अटल जी इसे खत्म करने पर विचार कर ही रहे थे कि एक भाजपा सांसद के नेतृत्व में करीब डेढ़ सौ सांसदों का जत्था अटल जी से मिला।

उसने इस फंड को बढ़ा देने का उनसे आग्रह किया। मिली जुली सरकार चलाने वाले अटल जी भला क्या करते! हालांकि बिहार के नेता नीतीश कुमार, राम विलास पासवान और लालू प्रसाद बहुत पहले ही यह कह चुके हैं कि यह फंड बंद हो जाना चाहिए। 

करीब 4 साल पहले पूर्व सांसद एरा  सेङियन ने अपने विस्तृत अध्ययन के बाद जो रपट तैयार की थी उससे भी यह साफ था कि जिस घोषित उद्देश्यों को ध्यान में रख कर यह फंड शुरू किया गया था, वे पूरे नहीं हो रहे हैं। अब गेंद मनमोहन सरकार के पाले में है। अच्छा हो कि वे राज्यसभा का अपना ही भाषण याद करके नेताओं और लोकतंत्र में गिरती लोगों की आस्था को और अधिक गिरने से रोक लें। क्या वे रोक पाएंगे?

sukishore_patna @ yahoo. co .in

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं ।

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