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शिक्षा : शिक्षकों को सिखाने के सवाल

शिक्षक का प्रशिक्षण शिक्षा का एक प्रमुख कार्य होता है। अमूमन पूरे साल भर ही शिक्षक प्रशिक्षण और इससे जुड़े कार्यक्रम होते रहते हैं। गर्मियों की छुट्टियों में प्रशिक्षणों की तीव्रता कुछ बढ़ जाती है। शिक्षक प्रशिक्षण को एक प्रमुख औजार मानकर चला जाता है कि इसके माध्यम से स्कूलों में बच्चों को सीखने-सिखाने की प्रक्रियाओं को पैना बनाया जा सकेगा। और बच्चों की समस्याओं को समझकर उनके निराकरण की ओर अग्रसर हुआ जा सकेगा। लेकिन अक्सर शिक्षकों के प्रशिक्षण में वह सब कुछ नहीं होता जो स्कूलों में बच्चों की सीखने की प्रक्रियाओं को सुचारु बनाए।

शिक्षा की सबसे बड़ी समस्या हैं, हाशिये पर रहने वाले वे बच्चे जो स्कूल यदि जा पाते हैं तो उनको कैसे सीखने-सिखाने के अवसर दिए जा सकें। इस वजह से हम इन प्रशिक्षणों की बनावट इस प्रकार से करें कि हाशिये के बच्चों को कैसे सिखाएं। ये ऐसे परिवारों के बच्चे हैं, जहां लिखने-पढ़ने की कोई सामग्री घरों में नहीं है। यह सबसे बड़ी चुनौती है।

शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर 1964-66 में दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में बने शिक्षा आयोग में यह चिंता व्यक्त की गई थी कि शिक्षक प्रशिक्षणों में सीखने-सिखाने को लेकर पारंपरिक ढांचे बने हुए हैं। कई अथरें में हम उन दकियानूसी परंपराओं को ही प्रÞाय देने आए हैं जो स्कूलों में सीखने-सिखाने की प्रक्रियाओं में बाधक बने हैं। यही वजह है कि शिक्षक प्रशिक्षणों का असर स्कूलों में शिक्षण को प्रभावित नहीं कर पाया। कोठारी आयोग की इस महत्वपूर्ण सिफारिश को आज तक ठीक ढंग से अमल नहीं कर पाए हैं।

प्रशिक्षणों में प्रभावी शिक्षण का अभाव हमेशा ही खलने वाली बात है। शिक्षकों का स्वभाव बन चुका है कि वो किसी भी नवाचार के कार्यक्रम में भाग लेने से कतराते हैं। दरअसल प्रशिक्षण किसी भी प्रयोग और नवाचार के प्रति डर का रवैया सिखाता है। और जो भी कुछ प्रशिक्षण कार्यक्रम आदि होते हैं, उनकी गंगा का उद्गम राजधानी से होता है। जो फिर पहुंचती है जिला स्तर पर। यहां से बहती हुई जाती है मैदानी स्तर पर। जब योजना उच्च स्तर से चलती है तो वहां आसीन विशेषज्ञों को मैदानी स्तर की समस्याओं का भान नहीं होता।

हमें कुशल शिक्षक तैयार करना है तो उसकी रणनीति अलग प्रकार से बनानी होगी। शिक्षक प्रशिक्षणों में मौलिकता पर कोई तवज्जो नहीं दी जाती। यही कारण है कि शिक्षक अपने स्कूल में जाने-अनजाने मौलिकता, स्वाभाविक अभिव्यक्तित, सृजनात्मकता जैसे अहम मुद्दों को दरकिनार करने की कोशिश करते रहते हैं। अब तक जितने भी शिक्षा के आयोग और नीतियां बनी हैं, वो इस बात की मांग करती है कि शिक्षा रुचिकर बने।

लेकिन इसके सार्थक प्रयास अब तक नहीं हुए हैं। या ऐसे प्रयास बुरी तरह से रौंद डाले गए। एक कक्षा का माहौल किस तरह से जीवंत बन सकता है, इस बात पर विमर्श नहीं हो पा रहा। आखिर कोई बच्चा स्कूल क्यों आए? यदि इस सीधे से सवाल का जवाब शिक्षा विभाग खोज ले और अपनी कार्य योजना तैयार कर लें तो काफी समस्याएं हल हो सकती है।

दरअसल प्रशिक्षण न तो शिक्षकों में आत्मविश्वास पनपाने का काम करते हैं और न ही उनको सहज रहने देता है। बाल केंद्रित शिक्षा पर लंबे और उबाऊ भाषण दिए जाते हैं। और फिर शिक्षकों से कहा जाता है कि बाल केंद्रित शिक्षा को अपनी स्कूल में क्रियान्वित करें। प्रशिक्षणों में शिक्षक को यही सिखाया जाता है कि जो भी उसको बताया जा रहा है वो सही है। एक शिक्षक यही भावना लेकर जब स्कूल में जाता है तो बच्चे यह सीखकर बड़े होते हैं कि उसने स्कूल में जो कुछ पढ़ा है, वही सही ज्ञान था। शिक्षकों के प्रशिक्षण का आखिरी पड़ाव होता है परीक्षा। वैसी ही परीक्षा जसी स्कूलों में बच्चों की ली जाती है।

परीक्षा को लेकर अब तक काफी कुछ कहा जा चुका है। दरअसल यह परीक्षा सीखने-सिखाने की प्रक्रियाओं को कुंद तो करती ही है साथ ही समाज में कई तरह के अपराधों को भी जन्म देती है। इसके बावजूद भी इस दोषपूर्ण परीक्षा पद्धति को न केवल अपनाए हुए हैं बल्कि वैधता करार देती है।

शिक्षकों के प्रशिक्षण को सही अथरें में सफल और सार्थक बनाना है तो उन तमाम प्रचलित मान्यताओं को दरकिनार करके नए सिरे से सोचना होगा। प्रशिक्षण के लिए मास्टर्स ट्रेनर्स को ही अपने पूर्वाग्रहों को तज कर एक ऐसी योजना बनानी होगी कि वो सब कुछ शिक्षकों को करवाएं जो कि उनको अपनी कक्षा में करवाना है। संभव है कि इससे आशा की कोई नई किरण दिखाई देने लगे।

लेखक विद्या भवन संदर्भ शिक्षा केन्द्र, उदयपुर से जुड़े हैं

krsharma_s@ gmail. com

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