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ईश्वर का जवाब

मंदी के दौर में नौकरी पर संकट आया हुआ था। परेशानी की चर्चा अपने मित्र से कर रहा था कि तभी उनकी आठ साल की बिटिया ने कहा- अंकल ‘प्रार्थना’ करो, देखो भगवान जरूर आपकी नौकरी बचाएंगे। उसकी सलाह मुझे तमाम सलाहों से प्रीतिकर लगी। प्रार्थना में वाकई चमत्कारिक शक्ित है। ऐसा नहीं होता तो धर्म की इस सबसे सरल और पुरानी इस अभिव्यक्ित का वजूद आज भी मौजूद नहीं होता। मनोविज्ञान इसे ईमानदार, करुणा से भरी और अहम खत्म करने वाली एक प्रक्रिया के रुप में देखता है। यह आप में विनम्रता और मानवीयता जैसे गुणों को भरती है, यानी आप जब भी प्रार्थना करते हैं पहले से कहीं अधिक मानवीय और विनम्र हो जाते हैं।

रामकृष्ण परमहंस कहते थे- ‘प्रार्थना शुष्क अंत:करण की निर्मिति नहीं, दिव्य अंत:करण का सृजन है।’ सच्ची प्रार्थना के लिए आपको एक ऐसे बच्चे के मानिंद विश्वासी होना होगा। मैक्सिम गोर्की बताते थे कि प्रार्थना के समय ईश्वर को वैसा मानना चाहिए जैसा उनकी नानी मानती थी न कि वैसा जैसा उनके नाना। गोर्की की नानी हमेशा माफ करने को तत्पर थीं, जबकि नाना हर गलतियों के लिए दंड देने को तैयार ताकत मानते थे।

एक सवाल अक्सर उठाया जाता है कि प्रार्थना के बाद ईश्वर का जवाब क्या होता है? इसका जवाब दादा वासवानी की किताब ‘लिटिल बुक ऑफ प्रेयर’ में है। इसके अनुसार ईश्वर के जवाब चार तरह के हो सकते हैं। पहला- ‘हां’। इसका अर्थ है, हम जो मांगते हैं, वह हमें हासिल होता है। दूसरा-‘नहीं’। यहां ईश्वर आपकी कामना का निषेध करता है। तीसरा है- ‘रुको’। ईश्वर आप से कह रहा है कि अभी तुम्हारी कामना पूरी होने का समय पूरा नहीं हुआ है। चौथा जवाब है- ‘कुछ और बेहतर’। इस स्थिति में ईश्वर से जो चीज मांगी गई हो, उसका बेहतर विकल्प वह हमारे आगे रखता है। अपनी समस्या के लिए मैंने भी प्रार्थना की और जवाब पाया ‘हां’। थैंक्यू प्रार्थना।

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