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मौसम का ताप

भारत में मौसम की भविष्यवाणी करना कोई आसान काम नहीं है, इसलिए मानसून के देरी से आने की वजह से ज्यादा फिक्रमंद अभी नहीं होना चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर तो सड़क के आम आदमी तक, बल्कि सारी दुनिया के आर्थिक क्षेत्र के बड़े लोगों की नजरें मानसून पर टिकी हैं।

इसकी दो वजहें हैं, पहली आर्थिक है, अगर भारत वैश्विक आर्थिक मंदी से उतना प्रभावित नहीं हुआ तो इसकी कड़ी वजह पिछले साल का अच्छा मानसून है और इस साल भी अगर अच्छी बारिश और अच्छी फसल की उम्मीद बनती है तो तरक्की की गति तेज हो जाएगी और अगर ऐसा नहीं हुआ तो मंदी से उबरने की गति धीमी पड़ जाएगी। इसकी वजह यह है कि इस वक्त समूचे उत्तर भारत में तेज गर्मी पड़ रही है और लू से लोग मर रहे हैं, जहां पानी की किल्लत थी, वहां किल्लत बढ़ गई है, ऐसे में बारिश का इंतजार ज्यादा ही लंबा महसूस होता है।

लेकिन दो चीजें शायद ध्यान देने की हैं, ऐसा नहीं है कि मानसून लेट नहीं होता है, वह अक्सर लेट होता है और फिलहाल बहुत देरी नहीं हुई है। दूसरे जब मानसून अच्छा नहीं होता तो भी समूचे देश में बहुत कम बारिश नहीं होती, अभी भी सामान्य से लगभग 7 प्रतिशत ही कम बारिश का अनुमान लगाया गया है।

मुश्किल यह होती है कि जिन-जिन इलाकों में कम बारिश होती है, वहां-वहां खेती पर बुरा प्रभाव पड़ता हे और पेय जल का संकट हो जाता है। लेकिन इसमें दोष मौसम का उतना नहीं, जितना मनुष्य का है। अब तक देश के बड़े हिस्से में खेती बारिश पर निर्भर है और पानी का इंतजाम इतना खराब है कि एक साल कम बारिश होने पर संकट आ जाता है।

अगर हम सचमुच आर्थिक महाशक्ति बनना चाहते हैं तो हमें अपने विकास की मौसम पर इस कदम निर्भरता घटानी होगी। मौसम तो अच्छा-बुरा होता रहता है, हमें सिंचाई और पेय जल का बेहतर इंतजाम करना सीखना होगा। लगभग 90 प्रतिशत बारिश में हमारे यहां हाहाकार नहीं मचना चाहिए और इससे कम बारिश शायद ही कभी होती हो। दूसरे, नियमित रूप से लू से लोगों के मरने का क्रम भी किसी आर्थिक महाशक्ति को शोभा नहीं देता। हम अगर अपने इंतजाम चुस्त-दुरुस्त रखें तो मौसम में कुछ हेर फेर हमें ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाएगा।

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