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सरबजीत को ना

अगर गंभीर विवादों में उलझी दो देशों की राजनीति फांसी की सजा पाए सरबजीत जैसे सामान्य भारतीय नागरिकों के धैर्य का इम्तहान ले रही है तो सरबजीत भी पाकिस्तान सरकार और उसकी न्यायपालिका के न्याय के लिए चुनौती बन कर खड़ा हुआ है।

पाकिस्तान सरबजीत को 18 साल पहले हुई फांसी की सजा को अभी तक अटका कर अपने देश में न्यायिक प्रक्रियाओं के निष्पक्ष होने की छवि तो पैदा करना चाहता है लेकिन यह छवि इसके साथ अन्य मामलों को देखने से खंडित होती है। हालांकि सरबजीत को फांसी देने के लिए न्यायपालिका लंबे समय से अड़ी हुई है और छोटी से बड़ी हर अदालत ने उसकी सजा की पुष्टि ही की है। पर इस बार सुप्रीम कोर्ट में दायर उसकी पुनर्विचार याचिका इसलिए खारिज हुई, क्योंकि उसके पक्ष के वकील पिछली कई तारीखों से अदालत में आ ही नहीं रहे थे।

इससे तो यह भी लगता है कि आतंकवाद की नर्सरी के रूप में कुख्यात पाकिस्तान आतंकी अपराधों के मामले में न्याय करने के बजाय न्याय का पाखंड कर रहा है। क्योंकि एक तरफ मुंबई आतंकी हमलों के सूत्रधार हाफिज सईद को लाहौर हाईकोर्ट से मुक्त कर दिया जाता है तो दूसरी तरफ एक भारतीय के खिलाफ किसी तरह की ढिलाई की गुंजइश ही नहीं दिख रही है।

दरअसल पाकिस्तानी शासक अपनी घरेलू राजनीति से लेकर विदेश नीति तक के लिए न्यायपालिका का इस्तेमाल करते हैं। यह बात वहां के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी की बर्खास्तगी और फिर बहाली के घटनाक्रम से भी प्रमाणित होती है। अब वे सरबजीत के बहाने अफजल गुरू और कसाब जैसे अभियुक्तों के बारे में भारत सरकार को संदेश भी देना चाहते हैं। वैसे अब सरबजीत को जीवनदान सिर्फ राष्ट्रपति जरदारी ही दे सकते हैं और उनके फैसले पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दबावों का असर होना चाहिए।

हालांकि इससे पहले राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ सरबजीत की एक क्षमादान याचिका खारिज कर चुके हैं। इसलिए अगर दबाव नहीं बनता है और जरदारी मुशर्रफ के इनकार को ही नजीर बनाते हैं तो सरबजीत का बचना नामुमकिन है। लेकिन अगर वे भारत के साथ वार्ता शुरू करने के लिए सद्भावपूर्ण माहौल बनाना चाहते हैं तो सरबजीत की फांसी की सजा माफ करने से उसमें एक हद तक कामयाबी मिल सकती है।

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