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एल-निनो

हाल में संयुक्त राष्ट्र की मौसम संबंधी सूचना से सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं क्योंकि इसके कारण सीधा असर मॉनसून की बरसात पर पड़ेगा, जिस कारण कृषि को नुकसान हो सकता है। मौसम संबंधी इस उथल-पुथल के पीछे का कारण एल-निनो को बताया गया है।

एल-निनो दक्षिणी वश्विक मौसम के उतार-चढ़ाव की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें प्रशांत महासागर का जल सामान्य से कहीं अधिक गर्म हो जाता है। इसकी वजह से दक्षिणी अमेरिका से दक्षिण-पूर्व और दक्षिण एशिया की ओर बहने वाली हवाओं की गति धीमी पड़ जाती है। जब मध्य प्रशांत महासागर का पानी गर्म होता है, उसके ऊपर का वातावरण गर्म हो जाता है। इसकी वजह से भारत के ऊपर के वातावरण में शुष्कता बढ़ती है जिसका असर मॉनसून पर पड़ता है। हालांकि प्रतिवर्ष एल-निनो मॉनसून के लिए बुरा नहीं होता।

एल-निनो का अर्थ स्पेनिश भाषा में ‘छोटा लड़का’ होता है, क्योंकि यह प्रक्रिया अक्सर क्रिसमस के आसपास दक्षिणी अमेरिका के निकट प्रशांत महासागर में देखने को मिलती है। इसका पहली बार 1923 में सर गिल्बर्ट थॉमस वॉकर ने अध्ययन किया था। एल-निनो के कारण दुनिया में बाढ़, सूखा जैसे अनेक मौसमी परिवर्तन आते हैं। यह पृथ्वी की जलवायु प्रक्रिया का प्राकृतिक अंग है। ग्लोबल वार्मिग के कारण इसके असर में कुछ बदलाव होगा, इसका अध्ययन हो रहा है। हालांकि, इसकी तीव्रता में कमी देखी गई है। इसकी समूची प्रक्रिया के बारे में भी पड़ताल अभी जारी है। चूंकि यह क्रिया भूमध्य रेखा के निकट होती है, इसलिए दोनों गोलार्ध पर इसका असर होता है। लेकिन दीर्घकालिक मौसमी परिवर्तनों की सूचना उतनी पुख्ता नहीं होती।

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