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दो टूक

जेठ कब का बीत चुका। आषाढ़ के इन दिनों में जबकि आसमान में घन-घमण्ड होना चाहिए था और मोटी-मोटी धार बरसनी चाहिए थी, ऊपर से आग बरस रही है। धूप की तीखी मार ऐसी है कि छाया भी छाया ढूँढ़ती फिर रही है। कंक्रीट के जंगल बन गए हमारे शहरों में छाया रह भी कहाँ गई।

रेगिस्तान बढ़ रहा है और बड़ी-बड़ी नदियों में भी पानी की धार पतली होती जा रही है। ऐसा नहीं कि पानी नहीं बरसेगा लेकिन जब बरसेगा तो हमारे शहर उसे संभाल नहीं पाएँगे। बेहद खफा प्रकृति विद्रोह पर उतारू है लेकिन हम उसकी चेतावनियाँ सुनने को तैयार नहीं हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कैसा समय छोड़ जाने वाले हैं, किसी को इसकी फिक्र है?

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