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क्रिकेट धर्म बनाम कॉमनवेल्थ गेम

भारत में क्रिकेट एक धर्म बन चुका है। बाकी के खेलों के प्रति अगर इतना ही पागलपन होता तो आज हम ओलंपिक और कॉमनवेल्थ खेलों में अपने पड़ोसी चीन की तरह ही आगे रहते। क्रिकेट की अंधी पट्टी के बाहर हमें कुछ नजर ही नहीं आता है। अगले ही साल दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम होने हैं, लेकिन इसके बावजूद भी अन्य खेल और खिलाड़ियों की तैयारी फीकी है। न तो खेल मंत्रालय और न ही ओलंपिक महासंघ को इसकी चिंता है। खुद को प्रहरी कहने वाली मीडिया भी दिन-रात सिर्फ क्रिकेट को ही ज्यादा तरजीह देता है। बाकी खेलों से जुड़ी सुविधाओं या फिर खामियों की बात करना तो जैसे इनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। इसका दुख तब और होगा जब मेजबान देश के रूप में हमारी झोली में पदकों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक रहेंगी।

रूतुल, ओल्ड राजेन्द्रनगर, नई दिल्ली

कर्मियों के साथ भेदभाव

केन्द्र सरकार ने घोषणा की है कि बजट के बाद वह छठे वेतन आयोग द्वारा की गई बढ़ोतरी की रकम को (एरियर की दूसरी किस्त) कर्मचारियों को देने जा रही है वहीं दिल्ली में एमसीडी के अंतर्गत आने वाले विभागों के कर्मियों को तो एरियर की पहली किस्त तक नसीब नहीं हो पाई है। यह भी तब, जबकि स्वयं सरकार ने पहली किस्त के भुगतान की डैड लाइन भी पिछला वित्तवर्ष यानी 31 मार्च 2009 तक रखी थी। एमसीडी के अंतर्गत आने वाले किंग्सवे कैम्प स्थित राजन बाबू टीबी अस्पताल के कर्मी आज तक पहली ही किस्त पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन्हें तनख्वाह तक कभी सही समय पर नहीं मिलती, लाख भटकने पर भी इनकी कहीं कोई सुनवाई भी नहीं होती।

अनन्त उनियाल ‘आनंद’,  दिल्ली

डीयू के लिए क्रेजी

दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए इन दिनों काफी जद्दोजहद है। देश भर से छात्र यहां एडमिशन की आस लिए बैठे हैं। कुछ तो इतने धैर्यवान हैं कि वो कहते दिख रहे हैं कि चलो यार इस बार डीयू में एडमिशन ना भी हुआ तो अगले साल फिर कोशिश करूंगा, लेकिन पढ़ाई डीयू में ही करनी है। ऐसी मानसिकता या फिर कहें कि सोच क्या किसी छात्र के लिए ठीक है? क्या एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय ही हमारी सफलता की गारंटी बन सकता है। मेरा मानना है कि बाहर की चकाचौंध हमारे अंदर रौशनी नहीं जगा सकती। ये बात हम सभी को ध्यान में जरूर रखनी चाहिए कि आखिर में पढ़ाई हमें ही करनी है न कि किसी विश्वविद्यालय को।

अनुराधा कुमारी, करोलबाग, नई दिल्ली

गला घोंटने की तैयारी

ऐसा लगता है कि लोकलुभावन घोषणाओं के शोर शराबे के बीच संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार 100 दिन में सूचना के अधिकार कानून-2005 में ऐसे संशोधन करने जा रही है जिसका सिर कटा हुआ होगा। आर टीआई एक्ट आम आदमी का एक हथियार है, जिससे वह सरकार और विभागों से मद में व्यय किए गए धन का हिसाब-किताब मांग सकता है। इसमें संभावित संशोधन यह हो सकता है कि उस पर दी गई टिप्पणियों को देने का प्रावधान हटा दिया जाए। सरकार की इस मंशा के विरुद्ध जनमत बनाना चाहिए।

सोहन सिंह भदौरिया, बीकानेर

तुम

रस्मों की हवा हो तुम,
जख्मों की दवा हो तुम।
निशां चेहरे के
अपनी दास्तां कहते
हम शेर, सवा हो तुम।

शरद जयसवाल, कटनी, म. प्र.

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