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पाकिस्तान से वार्ता के लिए बढ़ता दबाव

भारत पर इस बात के लिए जबर्दस्त दबाव डाला जा रहा कि वह पाकिस्तान के साथ संवाद शुरू करे। भारत ने मुंबई पर पाकिस्तानी प्रायोजित हमले के बाद यह घोषणा की थी जब तक पाकिस्तान दहशतगर्दी पर अंकुश नहीं लगाता, उसके साथ सुलह वार्ता का कोई अर्थ नहीं। परस्पर विश्वास बढ़ाने वाले प्रयास (कॉनफिडेंस बिल्डिंग मेज़र्स) एक तरफा ही रहे हैं। पाकिस्तान ने हर बार दोस्ती के लिए बढ़ाये हाथ को ठुकराया ही है। आरंभ में अमेरिका ने यह बात जरूर कही थी कि पाकिस्तान को इस बात का प्रमाण देना होगा कि वह तालिबान की खूनखराबे वाली हरकतों पर नियंत्रण का सार्थक प्रयास कर रहा है, पर कुछ महीने बीतते ही उसने खुद यह ‘शर्त’ भुला दी। जान पड़ता है कि दिखावे के तौर पर स्वात घाटी में पाकिस्तान ने जो सैनिक कार्यवाही की है, उससे ही अमेरिकी संतुष्ट हैं। यहां स्वात की घटनाओं के सच-झूठ के विस्तार से विश्लेषण नहीं किया जा सकता, पर इस इलाके में पाकिस्तान की सक्रियता अमेरिका के लिए भारत में उसकी शत्रुतापूर्ण हरकतों की रोकथाम से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

इससे भी ज्यादा क्लेशदायक बात यह है कि पाकिस्तान के हुक्मरानों की इच्छानुसार अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान के संबंधों में मनोवांछित सुधार के लिए ‘कश्मीर समस्या’ का समाधान बुनियादी मुद्दा स्वीकार कर लिया है। अभी हाल भारत के दौरे पर आये बर्न साहब ने यह फर्माया कि कश्मीर विवाद का निपटारा घाटी की जनता के इच्छानुसार ही हो सकता है। हैरत की बात यह कि कश्मीरी अवाम बार-बार चुनाव में हिस्सा ले अपनी इच्छा प्रकट कर चुका है। फिर जम्मू-कश्मीर राज्य सिर्फ श्रीनगर की घाटी तक सीमित नहीं। जम्मू और लद्दाख भी इसी प्रदेश का हिस्सा है। अमेरिकी सरकार को यह अधिकार किसने दिया है कि वह भारत की प्रभुसत्ता को चुनौती देने वाली दखलंदाज मध्यस्थता की कोशिश करे? बहुत देर तक भारतीय यह गलतफहमी भी पाले रहे हैं कि भारत का बहुत बड़ा बाजार अमेरिकी कंपनियों को ललचाता रहा है और भारत के साथ अपना व्यापार बढ़ाने के लिए अमेरिकी भारतीय राजनयिक प्रयासों को अपना समर्थन देते रहेंगे। इसी तरह का भ्रम यह भी है कि चीन की तुलना में वह भारत को तरजीह देंगे। हकीकत यह है कि बीपीओ को लेकर खासा असंतोष अमेरिका में है। जब तक उनकी जरूरत पूरा करने को प्रतिभाशाली भारतीय वैज्ञानिक अमेरिका जा बसने को आतुर अमेरिकी दूतावास के बाहर एच1 बी वीसा के लिए धक्का-मुक्की करते रहेंगे तबतक अमेरिका को कोई चिन्ता नहीं हो सकती।

इतना ही नहीं अमेरिकी सरकार ने भारतीय कंपनियों पर इस बात के लिए भी दबाव डालना शुरू कर दिया है कि वह उसके शत्रु ईरान के साथ कोई आर्थिक नाता न रखे। यह बात रिलायंस और टाटा जैसी बड़ी कंपनियों तक को डपट कर सुनाई जा चुकी है कि जो कोई ईरान के साथ व्यापार करेगा उसे अमेरिका के साथ कारोबार की आशा त्याग देनी चाहिए। विडंबना यह है कि ईरान के विरुद्ध किसी भी तरह का आर्थिक प्रतिबंध या निषेध अन्तरराष्ट्रीय समुदाय ने नहीं लगाया है। इस तरह के आचरण को भी भारत की स्वाधीनता को संकुचित करने वाला ही कहा जा सकता है।

परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग वाले करार पर हस्ताक्षर होने और इस पर अमेरिकी संसद की मोहर लगने के बाद हर्ष और उल्लास का जो वातावरण तैयार हुआ था, उसके धुंधलाने में ज्यादा देर नहीं लगी। उम्र जलवों में बसर हो ये जरूरी तो नहीं। जो लोग यह सुझ रहे थे कि संसार के दो प्रमुख जनतांत्रिक देशों के हितों में अद्भुत और अनिवार्य संयोग है वह भी यह मानने को मजबूर हो रहे है कि कम से कम पाकिस्तान के मामले में हमारे और उनके बीच गहरा मतभेद है। भारत के लिए पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित दहशतगर्दी से बढ़कर कोई चुनौती नहीं। दशकों से जारी पर्दे के पीछे से चलाई जा रही हजार प्रहारों की यह जंग हमारी एकता और अखंडता के लिए सबसे खतरनाक है। और अमेरिका इस साजिश से अनजान नहीं। जाने कैसे भारतीयों को यह भ्रम हो गया था कि अमेरिका अन्तरराष्ट्रीय आतंकवाद के विरुद्ध जिस मोर्चाबंदी की पेशकश कर रहा था, उसी का अभिन्न हिस्सा वह दहशतगर्दी भी है, जिसका शिकार हम होते रहें है। यह सोचने का कारण इतना भर था कि 9/11 वाले जिस हमले को अमेरिका ने ङोला था, उसे अंजाम देने वाले कट्टरपंथी इस्लामी तालिबान थे। इन रक्तबीज राक्षसों को जन्म देने वाला स्वयं अमेरिका है और यह सोचना नादानी थी कि अमेरिका अपने राष्ट्रहित और हिन्दुस्तानी राष्ट्रहित को एक समझेगा। ओबामा ने पदभार संभालते ही यह घोषणा की कि भले ही वह ईराक से अमेरिकी फौजों को वापस बुलायेंगे अफगानिस्तान में जनतंत्र की बहाली के लिए युद्ध को तेज किया जायेगा। इस मोर्चे पर सफलता को सुनिश्चित करने के लिए उनकी समझ में पाकिस्तान का सामरिक महत्व भारत से कहीं अधिक है। जब से उन्होंने अफ-पाक वाली अवधारणा का प्रतिपादन किया है, यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि पाकिस्तान की सरकार को खुश रखने में वह कोई कोर-कसर करने वाले नहीं।

दिवालियेपन की कगार पर खड़े पाकिस्तान की जान बचाने के लिए अमेरिकी सरकार ने उसे बहुत बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता दी है। सैनिक साज-सामान की आपूर्ति के मामले में भी पाकिस्तान की यात्रा कर रहे अमेरिकी राजनयिकों ने अपने वक्तव्यों में इस बारे में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है कि वह अपने पारंपरिक आश्रितों को निराश नहीं करेंगे। कुछ समय के लिए तो यह भी लगने लगा था कि परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी पाकिस्तान की परमाणविक तस्करी को अनदेखा कर वह उसके साथ भी भारत की तरह का ही समझौता करने की तैयारी कर रहे हैं। शीतयुद्ध के आरंभ से ही अमेरिकी सरकार दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान को कृत्रिम रूप से संतुलित करती रही है। क्षेत्र में अशांति और तनाव का प्रमुख कारण यह पक्षपात ही रहा है। आज भी ऐसा लगता है कि अमेरिका ने कोई सबक नहीं सीखा है और उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद भी अमेरिकी सरकार भारत को भी संयम बरतने की नसीहत देती रही है।

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लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

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